▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक शर्मा जी थे, जो कपड़े की एक बड़ी फैक्टरी के मालिक थे। कुछ समय बाद उनका मन प्रभु भक्ति में रमने लगा। जीवन में ऐसी घटना घटी कि उन्होंने अपना कारोबार बंद कर दिया और संत बन गए। अब वे प्रभु भक्ति करते और शाम को अनुयायियों को प्रवचन देते।
एक दिन उन्होंने अपने संत बनने की कहानी सुनाते हुए कहा, ‘एक दिन मैं फैक्टरी में बैठा था। तभी एक घायल कुत्ता वहां आया। वह किसी वाहन की चपेट में आ गया था और उसके तीन पैर टूट गए थे। वह केवल एक पैर के सहारे घिसटते हुए फैक्टरी तक पहुंचा। मुझे बहुत दया आई। मैंने सोचा कि उसे पशु अस्पताल ले जाऊं, लेकिन तभी मेरे मन में विचार आया कि यदि प्रभु हर जीव को भोजन देते हैं, तो मैं देखता हूं कि इस घायल कुत्ते को भोजन कैसे मिलता है।’
‘मैं रात तक उसे दूर से देखता रहा। तभी एक दूसरा कुत्ता फैक्टरी के दरवाजे के नीचे से अंदर आया। उसके मुंह में रोटी का टुकड़ा था। उसने वह रोटी घायल कुत्ते को दे दी। घायल कुत्ते ने किसी तरह उसे खाया। फिर यह रोज होने लगा। दूसरा कुत्ता उसके लिए भोजन लाता रहा और धीरे-धीरे घायल कुत्ता चलने लायक हो गया।’
‘यह देखकर मेरा प्रभु पर विश्वास इतना बढ़ गया कि मैंने फैक्टरी बंद कर दी और व्यापार छोड़कर प्रभु की राह पर निकल पड़ा। संत बनने के बाद भी मेरी जरूरतें किसी न किसी तरह पूरी होती रहीं।’
यह सुनकर एक अनुयायी जोर से हंसने लगा। शर्मा जी ने कारण पूछा तो उसने कहा, ‘आपने यह तो देख लिया कि प्रभु ने घायल कुत्ते के लिए भोजन भेजा, लेकिन यह नहीं देखा कि दोनों में बड़ा कौन था? खाने वाला या खाना खिलाने वाला? पहले आपकी फैक्टरी से हजारों लोगों के घरों का चूल्हा जलता था। तब आप भोजन खिलाने वाले कुत्ते की भूमिका में थे। अब आप स्वयं भोजन पाने वाले बन गए हैं।’
शर्मा जी की आंखें खुल गईं। अगले ही दिन उन्होंने अपनी फैक्टरी और कारोबार फिर शुरू कर दिया।
- शिक्षा: हमें अपना कर्म और जिम्मेदारी कभी नहीं छोड़नी चाहिए। ईश्वर पर विश्वास रखें, लेकिन अपने कर्म से विमुख न हों। क्योंकि कई बार ईश्वर दूसरों की मदद करने के लिए हमें माध्यम बनाते हैं।
