▪️ सूर्यकांत उपाध्याय

‘पंडित जी ने गोदाम पर दीपावली पूजा का सुबह 6 बजे का मुहूर्त बताया है। तुम सारी तैयारी अभी से कर लो।’
दुकान से घर आते ही द्वारका जी ने पत्नी से कहा। पत्नी ने मालाओं की याद दिलाई तो वे पड़ोसी शर्मा जी के साथ शाम की सैर पर निकल पड़े।
बाजार में फूल-मालाओं की कई दुकानें थीं। मोलभाव करते हुए उनकी नजर एक कोने में बैठी 14-15 साल की लड़की पर पड़ी। उसकी टोकरी में कुछ ही मालाएं थीं।
द्वारका जी ने हजारे की माला का भाव पूछा। लड़की ने 20 रुपए बताए। गुलाब की माला 50 रुपए की थी। द्वारका जी ने मोलभाव शुरू कर दिया। लड़की ने बताया कि उसने हजारे की माला 15 और गुलाब की माला 40 रुपए में खरीदी है, ‘कुछ तो मेरे लिए भी बचना चाहिए।’
द्वारका जी ने 15 हजारे और तीन गुलाब की मालाएं खरीद लीं, लेकिन बची तीन मालाओं को मुरझाया हुआ बताकर छोड़ दिया। जाते-जाते उन्होंने कहा, ‘थोड़ी देर में लौटकर ये भी ले लेंगे।’
मगर बातचीत में वे मालाएं लेना भूल गए। रात को पत्नी की याद दिलाने पर उन्हें बात याद आई। वे तुरंत बाजार पहुंचे। रात के 9 बज चुके थे। दुकानें बंद हो रही थीं, लेकिन वह लड़की अब भी वहीं बैठी थी।
उन्हें देखते ही वह बोली, ‘बाबूजी, आपको पता है मैं कितनी देर से आपका इंतजार कर रही हूं? मेरी मां घर पर भूखी होगी। यहां पुलिसवालों और बदमाशों ने भी परेशान किया।’
द्वारका जी ने कहा, ‘इतना ही था तो चली जाती।’
लड़की बोली, ‘कैसे चली जाती? आपकी अमानत मेरे पास थी। मां ने सिखाया है कि ग्राहक का विश्वास ही हमारी सबसे बड़ी पूंजी है। अगर आप नहीं आते तो कुछ देर और इंतजार करती, फिर आपके नाम से मंदिर में मालाएं चढ़ा देती।’
द्वारका जी निरुत्तर हो गए। उन्होंने एक माला लड़की के गले में डालकर 500 रुपए दिए और सारी मालाएं खरीद लीं। फिर उसे भोजन कराया और घर छोड़ने की बात कही।
लड़की ने संकोच किया तो द्वारका जी बोले, ‘बेटा, मैं साक्षात लक्ष्मी को भोग लगा रहा हूं। मना मत कर। मेरी लक्ष्मी पूजा तो आज ही हो गई।’
