▪️सूर्यकांत उपाध्याय

रामायण केवल धार्मिक कथा नहीं बल्कि पारिवारिक संबंधों, प्रेम, त्याग, कर्तव्य और भाईचारे की अद्भुत कहानी है। इसमें बड़े भाई राम के प्रति छोटे भाई भरत का सम्मान और समर्पण आज भी आदर्श माना जाता है।
कैकेयी ने मंथरा के कहने पर राजा दशरथ से दो वरदान मांगकर राम को चौदह वर्ष का वनवास दिला दिया और भरत के लिए अयोध्या का सिंहासन मांगा। लेकिन भरत ने मां की इच्छा को स्वीकार नहीं किया। वे सिंहासन ठुकराकर राम को वापस लाने के लिए चित्रकूट की ओर चल पड़े। उनके साथ गुरु वशिष्ठ, शत्रुघ्न, मंत्री, सेना और अयोध्यावासी भी थे।
चित्रकूट पहुंचने पर भरत ने राम को देखा। राम वल्कल धारण किए, जटाधारी और तपस्वी के रूप में थे। भरत उन्हें देखते ही उनके चरणों में गिर पड़े। कुछ क्षणों बाद दोनों भाइयों ने एक-दूसरे को गले लगा लिया। लक्ष्मण और शत्रुघ्न भी आपस में मिले। सीता इस भावुक मिलन की साक्षी बनीं।
भरत ने राम से अयोध्या लौटने की विनती की। उन्होंने कहा कि आपके बिना अयोध्या और राज्य की व्यवस्था संभव नहीं है। कैकेयी के अपराध को क्षमा कर दीजिए और वापस चलिए। लेकिन राम अपने पिता दशरथ के वचन को सर्वोच्च मानते हुए अपने निर्णय पर अडिग रहे।
राम ने भरत को समझाया कि पिता की आज्ञा का पालन करना पुत्र का धर्म है। उन्होंने भरत से अयोध्या लौटकर राज्य संभालने का आग्रह किया। भरत ने भी अपना कर्तव्य निभाने का संकल्प लिया, लेकिन राम के बिना सिंहासन स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
अंततः गुरु वशिष्ठ की सलाह पर भरत ने राम से उनकी पादुकाएं मांगीं। राम ने पादुकाएं भरत को सौंप दीं। भरत ने उन्हें सिंहासन पर स्थापित कर राज्य चलाने और चौदह वर्ष तक राम की प्रतीक्षा करने की शपथ ली।
राम ने केवल इतना कहा – ‘तथास्तु।’
