▪️सूर्यकांत उपाध्याय

घर की इकलौती बहू एक निजी बैंक में बड़े पद पर कार्यरत थी। घर में बुजुर्ग ससुर और पति के अलावा कोई नहीं था। पति का अपना कारोबार था।
हर सुबह ऑफिस जाते समय ससुर बहू को आवाज देकर कहते, ‘बहू, मेरा चश्मा साफ करके देती जा।’ काम की जल्दबाजी में बहू कभी-कभी झुंझला जाती, लेकिन कुछ कह नहीं पाती। पति की सलाह पर उसने एक दिन सुबह ही चश्मा साफ करके ससुर के कमरे में रख दिया। इसके बावजूद ससुर रोज ऑफिस जाते समय उससे चश्मा साफ करने को कहते रहे।
धीरे-धीरे बहू इस आदत से ऊब गई और उनकी बातों को अनसुना करने लगी। कुछ महीने बाद बुजुर्ग ससुर का निधन हो गया।
एक दिन घर की सफाई करते समय बहू को उनकी डायरी मिली। उत्सुकतावश उसने उसे खोला तो एक पन्ने पर लिखा था-
‘मेरी प्यारी बहू, आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में बच्चे घर से निकलते समय बड़ों का आशीर्वाद लेना भूल जाते हैं, जबकि यही आशीर्वाद मुश्किल समय में उनकी ढाल बनता है। जब तुम रोज मेरा चश्मा साफ करने के लिए झुकती थी, तब मैं मन ही मन अपना हाथ तुम्हारे सिर पर रखकर तुम्हें आशीर्वाद देता था।
तुम्हारी सास ने मरने से पहले मुझसे कहा था कि बहू को बेटी की तरह प्यार देना। उसे कभी यह महसूस मत होने देना कि वह अपने ससुराल में है। उसकी छोटी-मोटी गलतियों को नादानी समझकर माफ कर देना। बेटा, मैं रहूं या न रहूं, मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ रहेगा। सदा खुश रहो।’
डायरी पढ़ते ही बहू फूट-फूटकर रो पड़ी। ससुर को गुजरे दो साल से अधिक बीत चुके थे, लेकिन अब वह रोज घर से निकलने से पहले उनका चश्मा साफ करके मेज पर रख देती थी। उसे उम्मीद थी कि ससुर का अदृश्य हाथ आज भी उसके सिर पर आशीर्वाद रख रहा होगा।
- शिक्षा: रिश्तों का महत्व अक्सर उनके दूर चले जाने के बाद समझ आता है।
