▪️सूर्यकांत उपाध्याय

भारतीय दर्शन में शिव केवल संहार के देवता नहीं, बल्कि सृष्टि के मूल आधार और चेतना के प्रतीक भी हैं। शिव तत्व का अर्थ है वह परम सत्ता, जो स्थिर, अचल और समस्त सृष्टि को धारण करने वाली है। इसी दृष्टि से पृथ्वी को शिव के स्वरूप से जोड़ा गया है। पृथ्वी सबका भार सहती है, जीवन को जन्म देती है और प्रकृति के असंख्य रूपों को अपने भीतर समेटे रहती है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में जब चारों ओर जल ही जल था, तब पृथ्वी को स्थिर आधार देने का प्रश्न उठा। भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर पृथ्वी को समुद्र से बाहर निकाला। इसके बाद शिव की स्तुति की गई। शिव को सृष्टि का अचल आधार मानते हुए पृथ्वी की स्थिरता का श्रेय उनके तत्व को दिया गया। शेषनाग के फन पर पृथ्वी के टिके होने और शिव के त्रिशूल को उसका आधार मानने वाली कथाएं इसी आध्यात्मिक कल्पना को व्यक्त करती हैं।
शिव तत्व पंचमहाभूतों से भी जुड़ा है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश मिलकर सृष्टि की रचना करते हैं। इनमें पृथ्वी स्थिरता और धारण करने की शक्ति का प्रतीक है। शिव की जटाओं से गंगा का अवतरण जल और जीवन के प्रवाह का संदेश देता है, जबकि उनका डमरू सृष्टि की लय और नाद का प्रतीक है। शिवलिंग को भी ब्रह्मांडीय ऊर्जा और सृजन के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इसकी जलहरी प्रकृति और शक्ति के साथ शिव के अभिन्न संबंध को दर्शाती है।
पौराणिक परंपरा में पृथ्वी के सात द्वीपों और बारह ज्योतिर्लिंगों का विशेष महत्व है। सोमनाथ से लेकर रामेश्वरम और केदारनाथ तक स्थापित ज्योतिर्लिंग शिव की सर्वव्यापकता और प्रकृति के प्रति आस्था के प्रतीक हैं। काशी को प्रलय में भी शिव के संरक्षण में रहने वाली नगरी माना गया है।
विज्ञान पृथ्वी की स्थिरता को गुरुत्वाकर्षण, उसके लौहयुक्त केंद्र और चुंबकीय क्षेत्र जैसी प्राकृतिक प्रक्रियाओं से समझाता है। धार्मिक मान्यताओं को इन वैज्ञानिक तथ्यों का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं माना जा सकता, लेकिन दोनों के माध्यम से प्रकृति के महत्व को समझा जा सकता है।
शिव तत्व हमें धैर्य, सहनशीलता, संतुलन और संरक्षण का संदेश देता है। पृथ्वी माता की तरह सबका भार उठाती है और शिव की तरह विष को अपने भीतर समेटने का प्रतीक बनती है। इसलिए पेड़ लगाना, जल बचाना, अन्न का सम्मान करना और धरती को प्रदूषण से मुक्त रखना भी शिव आराधना का ही एक रूप है।
सच्ची शिवभक्ति केवल मंदिर में जल चढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उस प्रकृति की रक्षा में भी है, जो समस्त जीवन का आधार है।
