▪️सूर्यकांत उपाध्याय

भारत के पूर्व राष्ट्रपति और महान वैज्ञानिक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जीवन संघर्ष, अनुशासन और दृढ़ संकल्प की मिसाल है। उनके जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना हमें असफलता से सीखने की प्रेरणा देती है।
वर्ष 1979 में डॉ. कलाम भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के एसएलवी-3 मिशन के निदेशक थे। इस मिशन का उद्देश्य भारत के उपग्रह रोहिणी को अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित करना था। प्रक्षेपण के समय तकनीकी गड़बड़ी के कारण रॉकेट अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच सका और मिशन असफल हो गया।
इस असफलता की जिम्मेदारी तत्कालीन इसरो अध्यक्ष प्रोफेसर सतीश धवन ने स्वयं ली। उन्होंने मीडिया के सामने आकर मिशन की विफलता की जवाबदेही स्वीकार की और वैज्ञानिकों का मनोबल बनाए रखा।
अगले वर्ष, 18 जुलाई 1980 को एसएलवी-3 ने सफलतापूर्वक रोहिणी उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित कर दिया। इस बार प्रोफेसर सतीश धवन ने सफलता का श्रेय अपनी टीम और डॉ. कलाम को दिया तथा उन्हें मीडिया के सामने भेजा।
इस घटना से डॉ. कलाम ने नेतृत्व का एक बड़ा सबक सीखा। उन्होंने बाद में बताया कि एक सच्चा नेता असफलता की जिम्मेदारी स्वयं लेता है और सफलता का श्रेय अपनी टीम को देता है।
- शिक्षा: असफलता अंत नहीं, सीखने का अवसर है। जो व्यक्ति कठिन समय में अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करता है और निरंतर प्रयास करता रहता है, सफलता अंततः उसका रास्ता खोज लेती है।
