■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक शाम, जब मैं दफ्तर से लौटा, पत्नी मुस्कुराते हुए बोलीं, “अगर मैं कहूँ कि तुम्हें किसी और के साथ डिनर और फिल्म पर जाना है तो क्या करोगे?”
मैंने हँसते हुए कहा, “तो समझ लूँगा कि अब तुम मुझसे प्यार नहीं करतीं।”
वो बोलीं, “नहीं… मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ पर एक औरत है जो तुमसे उतना ही प्यार करती है और वो तुम्हारे साथ थोड़ा वक्त बिताना चाहती है।”
मैंने पूछा, “कौन?”
पत्नी बोलीं, “तुम्हारी माँ…”
उनके शब्द दिल में उतर गए। सचमुच, माँ अकेली रहती थीं। काम और व्यस्तता के बीच उनसे मिले महीनों बीत चुके थे। उसी रात मैंने फ़ोन किया, “माँ, इस शुक्रवार डिनर और फिल्म चलोगी?”
कुछ पल चुप रहकर माँ बोलीं, “सब ठीक तो है बेटा?”
मैंने हँसकर कहा, “हाँ माँ, बस तुम्हारे साथ थोड़ा समय बिताना चाहता हूँ।”
शुक्रवार को जब मैं पहुँचा, माँ दरवाजे पर तैयार खड़ी थीं। सजी-धजी, मुस्कुराती हुईं। मैंने कहा, “माँ, आज तो आप बहुत सुंदर लग रही हैं।”
वो बोलीं, “मैंने सहेलियों से कहा, आज बेटे के साथ डिनर पर जा रही हूँ… सब खुश थीं।”
हम एक छोटे, सुकून भरे रेस्तरां पहुँचे। मैं मेन्यू देखने लगा तो माँ बोलीं, “जब तुम छोटे थे, मैं तुम्हारे लिए मेन्यू पढ़ती थी।”
मैंने कहा, “आज मैं आपके लिए पढ़ूँगा, माँ।”
हमने पुराने किस्से, पापा की बातें, मेरी शरारतें याद कीं। फिल्म का समय निकल गया पर वो शाम किसी फिल्म से कम नहीं थी। जाते वक्त माँ ने कहा, “अगली बार बिल मुझे भरने देना।”
मैं बोला, “इससे क्या फर्क पड़ता है?”
वो मुस्कुराईं, “फर्क पड़ता है बेटा, इससे लगता है कि मैं भी तुम्हारे लिए कुछ कर सकती हूँ।”
कुछ दिनों बाद माँ को दिल का दौरा पड़ा और वो चली गईं। फिर एक दिन उनके नाम से लिफाफा आया। उसमें रेस्तरां की रसीद और एक खत था- “बेटा, पता नहीं अगली बार तुम्हारे साथ जा पाऊँ या नहीं,
इसलिए मैंने दो लोगों के खाने का भुगतान कर दिया है।
अगर मैं न रहूँ, तो अपनी पत्नी के साथ जरूर जाना।
तुम्हारे साथ बिताई वो शाम मेरी सबसे सुंदर याद है।
भगवान तुम्हें खुश रखे।
I love you — तुम्हारी माँ।”
खत पढ़कर आँसू थम नहीं पाए। तभी समझ आया कि प्यार जताने के लिए शब्द नहीं, समय चाहिए।

हृदय स्पर्शी