■ अब इंजेक्शन नहीं, टैबलेट से मिलेगा लाभ, लेकिन क्या यह दिल के दौरे का खतरा घटाएगी?

● नई दिल्ली।
रक्त में बढ़ा हुआ एलडीएल (Low-Density Lipoprotein) यानी “खराब कोलेस्ट्रॉल” हृदयाघात का प्रमुख कारण माना जाता है। अब वैज्ञानिकों ने एक नई प्रयोगात्मक गोली विकसित की है जो एलडीएल को 60 प्रतिशत तक घटा सकती है। इस गोली का नाम एनलिसिटाइड (Enlicitide) है और इसे स्टैटिन दवाओं के साथ देने पर अद्भुत परिणाम मिले हैं।
फिलहाल ऐसे उपचार पीसीएसके9 (PCSK9) नामक लिवर प्रोटीन को अवरुद्ध करने वाले इंजेक्शन के रूप में दिए जाते हैं, जो शरीर की कोलेस्ट्रॉल साफ करने की क्षमता को बढ़ाते हैं। लेकिन अब यही कार्य एक गोली के रूप में संभव हो सका है। मैक्स हेल्थकेयर के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. बलबीर सिंह के अनुसार, “इंजेक्शन की तुलना में रोज़ाना ली जाने वाली गोली मरीजों के लिए अधिक सुविधाजनक होगी, हालांकि इसके दीर्घकालिक प्रभावों का आकलन अभी बाकी है।”
तीसरे चरण के परीक्षणों में पाया गया कि जिन मरीजों ने एनलिसिटाइड को स्टैटिन के साथ 24 सप्ताह तक लिया, उनके एलडीएल स्तर में औसतन 60 प्रतिशत की गिरावट आई। यह उन मरीजों की तुलना में था जिन्होंने केवल स्टैटिन या प्लेसीबो लिया था। इस अध्ययन में 14 देशों के 2,912 मरीजों को शामिल किया गया था, जिनकी औसत आयु 63 वर्ष थी। यह शोध अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के वैज्ञानिक सत्रों में प्रस्तुत किया गया। दवा निर्माता कंपनी मर्क (Merck) अब जल्द ही एफडीए अनुमोदन के लिए आवेदन करने वाली है।

स्टैटिन दवाएँ अधिकतम 40 प्रतिशत तक खराब कोलेस्ट्रॉल घटाती हैं, परंतु कुछ लोगों में यह पर्याप्त नहीं होता। इसका कारण वंशानुगत हाइपरकोलेस्ट्रोलेमिया या फिर यकृत, गुर्दे अथवा थायरॉयड की गड़बड़ी भी हो सकती है।
स्पर्श हॉस्पिटल, बेंगलुरु के वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. रंजन शेट्टी बताते हैं, “स्टैटिन और पीसीएसके9 अवरोधक दोनों अलग-अलग तरीके से काम करते हैं। स्टैटिन लिवर में बनने वाले कोलेस्ट्रॉल को रोकते हैं, जबकि पीसीएसके9 अवरोधक रक्त से एलडीएल को साफ़ करते हैं। इसीलिए इन्हें साथ में दिया जाता है ताकि अधिकतम लाभ मिले।”
क्या भविष्य में यह गोली अकेले ली जा सकेगी? इसपर डॉ. सिंह का उत्तर स्पष्ट है “नहीं, यह स्टैटिन का विकल्प नहीं है बल्कि उसका पूरक है।”
उनका मानना है कि गोली के रूप में यह दवा इंजेक्शन की तुलना में सस्ती और अधिक सुलभ होगी। “इसे तैयार करने में वैज्ञानिकों को लगभग दस वर्ष का समय लगा है। अगर यह सफल रही तो हृदय रोगों की रोकथाम में यह एक ऐतिहासिक कदम साबित होगी।”
