■ सूर्यकांत उपाध्याय

यह संसार कर्मों का बंधन है। जो बोते हैं, वही काटते हैं।
एक फौजी था। अनाथ पर निडर और ईमानदार। वह अपना सारा वेतन फौज में जमा करता जा रहा था। एक दिन उसका परिचय एक सेठ से हुआ जो फौज में सामान सप्लाई करते थे। सेठजी बोले, “तुम्हारे पैसे बेकार पड़े हैं, मुझे दे दो, मैं कारोबार में लगाऊँगा, पैसा बढ़ जाएगा।” फौजी ने विश्वास किया और सारा धन सौंप दिया। सेठजी का व्यापार खूब चल पड़ा।
फिर युद्ध छिड़ गया। फौजी वीरता से लड़ा और युद्धभूमि में शहीद हो गया। जब सेठ को यह खबर मिली तो उन्होंने मन ही मन सोचा,“अब लेने वाला कोई नहीं, सारा धन मेरा हो गया।”
कुछ वर्षों बाद सेठजी के घर पुत्र हुआ। वे फूले नहीं समाए, “धन भी मिला, संतान भी।” बेटा बड़ा होकर सुशील और बुद्धिमान निकला। उसकी शादी कर दी गई पर विवाह के बाद अचानक वह बीमार पड़ गया। दवा-दारू, वैद्य, हकीम, डॉक्टर सब कर डाला, लेकिन रोग बढ़ता गया। अंत में डॉक्टरों ने कहा, “अब यह नहीं बचेगा।”
सेठजी टूट गए। रास्ते में एक आदमी ने कहा, “पास के गाँव में वैद्य है, दो आने की पुड़िया से मुर्दे भी जी उठते हैं।” आशा बंधी, पुड़िया लाए, बेटे को खिलाई पर वह खाते ही चल बसा।
सारा गाँव रो पड़ा। तभी वहाँ एक सिद्ध महात्मा पहुँचे। उन्होंने पूछा, “सेठजी, क्यों रो रहे हो?”
सेठ बोले, “महाराज, मेरा जवान बेटा चला गया।”
महात्मा मुस्कराए, “जब फौजी ने तुम्हें पैसा दिया था तब तुम खुश हुए थे और जब वह मरा, तब और प्रसन्न। वही फौजी आज तुम्हारा पुत्र बनकर अपना लेन-देन चुकाने आया था। जब हिसाब बराबर हो गया तो चला गया।”
सेठ बोले, “महाराज, वह बहू जो विधवा हो गई, उसका क्या अपराध?”
महात्मा बोले, “वही घोड़ी है, जिसने युद्ध में फौजी को धोखा दिया था। कर्मों का न्याय बड़ा सूक्ष्म है।”
संत बोले, “जिसके जैसे कर्म हैं, उसके वैसा ही जीवन है। जो ईश्वर-स्मरण में रहते हैं, सत्य और करुणा का पालन करते हैं, उनके भारी पाप भी ईश्वर की कृपा से सूली से काँटे बन जाते हैं।”
सीख: सदैव सद्कर्म करो, सच्चाई से जियो और ईश्वर को स्मरण करते रहो, यही हमारे जीवन का सच्चा धर्म है।
