■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार एक जिज्ञासु व्यक्ति ने एक संत से प्रश्न किया, “महाराज, रंग-रूप और बनावट प्रकृति में एक जैसी होने के बावजूद कुछ लोग अत्यधिक उन्नति कर लेते हैं, जबकि कुछ लोग पतन के गर्त में डूब जाते हैं। ऐसा क्यों होता है?”
संत ने उत्तर दिया, “तुम कल सुबह मुझे तालाब के किनारे मिलना। तब मैं तुम्हें इस प्रश्न का उत्तर दूंगा।”
अगले दिन वह व्यक्ति सुबह तालाब के किनारे पहुँचा। उसने देखा कि संत दोनों हाथों में एक-एक कमंडल लिए खड़े हैं।
ध्यान से देखने पर उसने पाया कि एक कमंडल सही है, जबकि दूसरे की पेंदी में एक छेद है। संत ने उसके सामने ही दोनों कमंडल तालाब के जल में फेंक दिए। सही वाला कमंडल तो तालाब में तैरता रहा, लेकिन छेद वाला कमंडल थोड़ी देर तैरने के बाद, जैसे-जैसे पानी अंदर प्रवेश करता गया, डूबने लगा और अंत में पूरी तरह डूब गया।
संत ने कहा-
“जिस प्रकार दोनों कमंडल रंग-रूप और प्रकृति में एक समान थे, किंतु दूसरे कमंडल में छेद होने के कारण वह डूब गया, उसी प्रकार मनुष्य का चरित्र ही इस संसार-सागर में उसे तैराता है। जिसके चरित्र में छेद (दोष) होता है, वह पतन के गर्त में चला जाता है। जबकि एक सच्चरित्र व्यक्ति इस संसार में उन्नति करता है।”
जिज्ञासु व्यक्ति को अपने प्रश्न का उत्तर मिल चुका था।
शिक्षा: जीवन में चरित्र का महत्व सर्वोपरि है। इसलिए हमें सदैव चरित्रवान बनने का प्रयास करना चाहिए।
