
■ सूर्यकांत उपाध्याय
एक औरत रोटियाँ बनाते हुए “ॐ नम: शिवाय” का जाप कर रही थी। अलग से पूजा का समय निकाल पाना उसके लिए संभव नहीं था, इसलिए वह काम करते-करते ही ध्यान लगा लेती थी।
अचानक धड़ाम की तेज आवाज के साथ एक दर्दनाक चीख सुनाई दी। उसका कलेजा धक से रह गया। आँगन में दौड़कर देखा तो आठ साल का चुन्नू चित्त पड़ा था, खून से लथपथ।
मन हुआ कि जोर से रो पड़े पर घर में उसके अलावा कोई दूसरा था नहीं। रो कर किसे पुकारती? और चुन्नू को संभालना भी जरूरी था।
वह भागकर नीचे गई तो देखा, चुन्नू आधी बेहोशी में “माँ… माँ…” पुकारे जा रहा है।
ममता उमड़ पड़ी और आँखों से आँसू बह निकले।
दस दिन पहले हुए अपेंडिक्स ऑपरेशन के बावजूद न जाने कहाँ से इतनी शक्ति आ गई कि वह चुन्नू को गोद में उठाकर सीधे पड़ोस के नर्सिंग होम की ओर दौड़ पड़ी।
रास्ते भर वह भगवान को कोसती रही, “हे महादेव, मैंने क्या बिगाड़ा था तुम्हारा, जो मेरे ही बच्चे को…!”
खैर, डॉक्टर साहब मिल गए और समय पर इलाज हुआ तो चुन्नू बिल्कुल ठीक हो गया। चोटें गहरी नहीं थीं, ऊपरी ही थीं, इसलिए कोई बड़ी कठिनाई नहीं हुई।
रात को जब सब लोग टीवी देख रहे थे, तब उस स्त्री का मन बेचैन था।
भगवान से विरक्ति-सी होने लगी थी। एक माँ की पीड़ा मानो प्रभु सत्ता को चुनौती दे रही थी।
दिन की सारी घटनाएँ चलचित्र की तरह आँखों के सामने घूमने लगीं। कैसे चुन्नू आँगन में गिरा, इसकी कल्पना भर से आत्मा सिहर उठी।
कल ही उसने पुराने चापाकल के पाइप का टूटा टुकड़ा आँगन से हटवाया था।
ठीक उसी जगह चुन्नू गिरा था। अगर कल मिस्त्री न आया होता तो…?
उसका हाथ अपने पेट पर गया जहाँ टाँके अभी ताजे ही थे।
आश्चर्य हुआ कि 20–22 किलो के चुन्नू को उसने उठाया कैसे?
कैसे वह आधा किलोमीटर लगातार दौड़ती चली गई?
सामान्य दिनों में तो वह कपड़ों की बाल्टी तक छत पर नहीं ले जा पाती।
फिर उसे याद आया, डॉक्टर साहब तो 2 बजे तक ही रुकते हैं और वह अस्पताल पहुँची साढ़े 3 बजे। फिर भी डॉक्टर वहीं थे और जाते ही तुरंत इलाज शुरू हो गया, मानो किसी ने उन्हें रोक रखा हो।
अब सब स्पष्ट था। उसका सिर प्रभु चरणों में श्रद्धा से झुक गया। उसने मन ही मन अपने कटु शब्दों के लिए क्षमा माँगी।
तभी टीवी पर ध्यान गया।
प्रवचन चल रहा था…
“प्रभु कहते हैं, ‘मैं तुम्हारे आने वाले संकट रोक नहीं सकता लेकिन तुम्हें इतनी शक्ति अवश्य दे सकता हूँ कि तुम उन्हें सहजता से पार कर सको। तुम्हारी राह आसान कर सकता हूँ। बस, धर्म के मार्ग पर चलते रहो।”
