■ सूर्यकांत उपाध्याय

करीब 7 बजे शाम को मोबाइल बजा।
उठाया तो उधर से रोने की आवाज आई।
मैंने शांत कराया और पूछा,“भाभीजी, आखिर हुआ क्या?”
उधर से बस इतना, “आप कहां हैं? कितनी देर में आ सकते हैं?”
मैंने कहा, “आप परेशानी बताइए… भाई साहब कहां हैं? माताजी किधर हैं? आखिर हुआ क्या?”
लेकिन उधर से सिर्फ एक ही बात, “आप आ जाइए।”
मैंने आश्वासन दिया कि कम से कम एक घंटा लगेगा। जैसे-तैसे घबराहट में पहुंचा।
देखा कि भाई साहब (हमारे मित्र, जो जज हैं) सामने बैठे हैं।
भाभीजी रो रही हैं, 12 साल का बेटा परेशान है, 9 साल की बेटी भी कुछ नहीं बोल पा रही।
मैंने भाई साहब से पूछा, “आखिर क्या बात है?”
भाई साहब कोई जवाब नहीं दे पाए।
तभी भाभीजी बोलीं, “ये देखिए तलाक के पेपर। ये कोर्ट से तैयार कराए हैं। मुझे तलाक देना चाहते हैं।”
मैं चौंक गया,“ये कैसे हो सकता है? इतनी अच्छी फैमिली, दो बच्चे, सबकुछ सेटल्ड… प्रथम दृष्टि में मुझे लगा ये मजाक है।”
मैंने बच्चों से पूछा, “दादी किधर हैं?”
उन्होंने बताया-पापा ने उन्हें तीन दिन पहले नोएडा के वृद्धाश्रम में शिफ्ट कर दिया है।
मैंने नौकर से चाय के लिए कहा। कुछ देर बाद चाय आई। मैंने बहुत कोशिश की कि भाई साहब चाय पी लें, लेकिन उन्होंने नहीं पी। कुछ ही देर में मासूम बच्चे की तरह फूट-फूटकर रोने लगे।
बोले-“मैंने तीन दिन से कुछ नहीं खाया है। अपनी 61 साल की माँ को अनजान लोगों के हवाले करके आया हूँ।
पिछले एक साल से घर में माँ के लिए इतनी मुश्किलें हो गईं कि पत्नी ने कसम खा ली थी कि ‘मैं माँ का ध्यान नहीं रख सकती’।
न वो उनसे बात करती थीं, न बच्चे।
रोज मेरे कोर्ट से आने के बाद माँ खूब रोती थीं।
नौकर तक मनमानी करने लगे थे।”
भाई साहब रोते हुए बोले-“माँ ने दस दिन पहले कहा-‘बेटा, मुझे ओल्ड एज होम में शिफ्ट कर दे।’
मैंने बहुत समझाया, लेकिन किसी ने माँ से सीधे मुंह बात नहीं की।”
फिर वे टूटकर बोले, “जब मैं दो साल का था, पापा की मृत्यु हो गई।
माँ ने दूसरों के घरों में काम करके मुझे पढ़ाया, मुझे इस काबिल बनाया कि आज मैं जज हूँ।
लोग कहते हैं-माँ काम पर भी जाती थीं तो मुझे अकेला नहीं छोड़ती थीं।
उस माँ को मैं ओल्ड एज होम में शिफ्ट कर आया हूँ।”
वे रुक-रुककर अपने दर्द सुनाते रहे- “10वीं की परीक्षा में, माँ रात-रात भर मेरे साथ बैठती थीं। एक बार माँ को बहुत तेज बुखार था, मैं स्कूल से लौटा तो उनका शरीर तप रहा था।
हंसकर बोली-‘अभी खाना बना रही थी ना, इसलिए गर्म है।’ लोगों से उधार मांगकर उन्होंने मुझे एलएलबी तक पढ़ाया। ट्यूशन भी नहीं करने देती थीं कि कहीं मेरा वक्त खराब न हो।”
वे रो पड़े, “जब ऐसी माँ के हम नहीं हो सके तो बीवी और बच्चों के क्या होंगे? अगर माँ हमें बोझ लगने लगे तो हमारी संस्कृति की रीढ़ टूट जाएगी।”
बोले- “अगर आजादी इतनी प्यारी है और माँ बोझ है, तो मैं उन्हें नहीं छोड़ सकता। बच्चे भी पल जाएंगे। मैं तलाक देना चाहता हूँ। सारी प्रॉपर्टी इनके हवाले कर दूंगा और माँ के साथ उसी आश्रम में रहूंगा।”
बातें करते-करते रात के 12:30 बज गए।
भाभीजी के चेहरे पर प्रायश्चित्त और ग्लानि साफ दिख रही थी।
मैंने ड्राइवर से कहा-आज ही नोएडा चलेंगे। हम सब नोएडा पहुंचे।
बहुत रिक्वेस्ट करने पर गेट खुला।
भाई साहब ने गेटकीपर के पैर पकड़ लिए-“मेरी माँ है… मैं उन्हें लेने आया हूँ।”
चौकीदार बोला-“जहां सारे सबूत सामने हों, वहाँ आप अपनी माँ के साथ न्याय नहीं कर पाए तो दूसरों के साथ क्या न्याय करेंगे साहब?”
अंदर से वार्डन आईं। बोलीं-“2 बजे रात को अगर आप इन्हें ले जाकर कुछ कर दें, तो मैं अपने ईश्वर को क्या जवाब दूंगी?”
हम विनती करते रहे।
अंत में वे हमें कमरे में ले गईं।
जो दृश्य था-कहना मुश्किल है।
कमरे में फैमिली की एक फोटो रखी थी, और माँ उसी के पास जैसे किसी बच्चे को सुलाए हों। जब हमने कहा, “हम आपको लेने आए हैं” तो पूरी फैमिली एक-दूसरे को पकड़कर रोने लगी।
आसपास के बुजुर्ग भी जागकर बाहर आ गए। उनकी आँखें भी नम थीं।
कुछ देर बाद तैयारी हुई।
सारा आश्रम बाहर तक आया।
सबकी आँखों में यही सवाल-
“क्या कोई हमें भी ले जाएगा?”
रास्ते भर बच्चे और भाभीजी शांत रहे,
लेकिन भाई साहब और माँ अपने पुराने रिश्ते की भावनाओं में डूबे हुए थे।
घर पहुंचते-पहुंचते 3:45 हो गए।
भाभीजी को भी अपनी खुशी की असली चाबी मिल चुकी थी।
मैं भी लौट आया लेकिन रास्ते भर वे दृश्य घूमते रहे।
मित्रों, माँ केवल माँ है। उसे मरने से पहले मत मारिए। माँ हमारी ताकत है। जननी को बेसहारा मत होने दें।
