■ सूर्यकांत उपाध्याय

बहुत समय पहले राजा विक्रम नामक एक न्यायप्रिय राजा थे। उसकी सेना, राज्य और वैभव दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे। पर एक बात और थी, जिसके लिए वह विशेष रूप से जाना जाता था, अपने प्रिय सफेद घोड़े “चंद्रकेतु” के प्रति उसका गहरा प्रेम। कहा जाता था कि वह घोड़ा हवा से बातें करता था, हालांकि उड़ नहीं सकता था।
एक दिन चोरी और साज़िश के झूठे आरोप में दो नौजवान आरव और नील पकड़े गए। अदालत ने दोनों को मृत्युदंड सुनाया। तय हुआ कि एक वर्ष बाद उन्हें फाँसी दी जाएगी। तभी आरव के मन में एक अनोखा विचार आया। जब राजा विक्रमादित्य ने उनसे अंतिम इच्छा पूछी, तो आरव ने झुककर कहा,
“महाराज! यदि आप मुझे एक वर्ष की मोहलत दें तो मैं आपके प्रिय घोड़े ‘चंद्रकेतु’ को उड़ना सिखा दूँगा।”
दरबार में सन्नाटा छा गया। सबको लगा कि यह युवक पागल हो गया है। मंत्री और सैनिक हँस पड़े। राजा ने आश्चर्य से पूछा, “क्या सच में तुम यह कर सकते हो?”
आरव ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “प्रयास करने की अनुमति दीजिए, परिणाम भगवान पर छोड़ दीजिए।”
राजा, जो अपने घोड़े से अत्यंत प्रेम करता था, यह सोचकर उत्साहित हो गया कि यदि यह संभव हुआ तो वह उड़ने वाले घोड़े की सवारी करने वाला संसार का पहला व्यक्ति होगा। उसने आदेश दिया, “इस युवक को एक वर्ष का समय दिया जाए। यदि घोड़ा उड़ना सीख गया तो इसे मुक्त कर दिया जाएगा; अन्यथा इसकी मृत्यु निश्चित होगी।”
जब आरव और नील को वापस जेल लाया गया, तो नील ने नाराज़ होकर कहा,“तू पागल है, आरव! घोड़ा कभी उड़ नहीं सकता। तूने अपनी मौत को केवल एक साल के लिए टाल दिया है।”
आरव मुस्कुराया और बोला,“नहीं, मित्र। मैंने अपने लिए चार रास्ते खुले रखे हैं।”
“चार रास्ते?” नील ने हैरानी से पूछा।
आरव बोला,“पहला-एक साल में राजा की मृत्यु हो जाए, तब सजा बदल सकती है।
दूसरा-संभव है कि मैं ही मर जाऊँ और यह चिंता समाप्त हो जाए।
तीसरा-घोड़ा मर जाए, तब मुझ पर कोई दोष नहीं रहेगा।
और चौथा-कौन जाने, शायद मैं सचमुच घोड़े को उड़ना सिखा दूँ!”
नील अवाक रह गया। आरव ने धीरे से कहा,“देखो नील, जब तक साँस है, तब तक उम्मीद है। कौन जानता है, भविष्य क्या मोड़ ले आए?”
दिन बीतने लगे। आरव हर दिन घोड़े की देखभाल करने लगा। वह उससे बातें करता, उसे सहलाता और कभी-कभी बाँसुरी भी बजाता। धीरे-धीरे चंद्रकेतु और आरव के बीच एक अनोखा रिश्ता बन गया।
राजा को भी यह देखकर आश्चर्य होता था कि जहाँ अन्य लोग घोड़े के पास जाने से डरते थे, वहीं आरव उसके साथ खेलता, दौड़ता और गाता था। लोग मज़ाक उड़ाते,“देखो, उस मूर्ख कैदी को! घोड़े को उड़ना सिखा रहा है।” पर आरव हर हँसी को अनसुना कर देता।
समय के साथ कई घटनाएँ घटीं। राज्य में युद्ध हुआ, बारिश कम हुई और राजा बीमार पड़ गया। अपनी स्थिति देखकर राजा को आरव और उसका वादा याद आया। वह बोला,“यह युवक घोड़े को उड़ना न भी सिखा सका तो भी इसने मेरे दिल को छू लिया है।”
राजा ने आदेश दिया कि आरव की सज़ा माफ कर दी जाए क्योंकि उसमें उम्मीद की अद्भुत शक्ति थी।
कुछ महीनों बाद राजा का निधन हो गया। उसका पुत्र नया राजा बना, जो अपने पिता की दयालुता का प्रशंसक था। उसने आरव को पूर्णतः आजाद कर दिया।
नील ने आँसू भरकर कहा,“तू सही था, आरव! तेरी उम्मीद ने सचमुच चमत्कार कर दिखाया। घोड़ा तो नहीं उड़ा पर तेरी ज़िंदगी ने ज़रूर उड़ान भर ली।”
आरव मुस्कुराया और बोला,“देख नील, ज़िंदगी हमेशा वैसी नहीं होती जैसी हम सोचते हैं। पर जो व्यक्ति आशा नहीं छोड़ता, वह हर परिस्थिति में रास्ता खोज ही लेता है। जब तक जीवन है, संभावनाएँ हैं। हार मानने से पहले हमेशा सोचो-शायद कल कुछ ऐसा घट जाए, जो आज नामुमकिन लगता है।”
उम्मीद ही वह घोड़ा है, जो हमें अंधकार से उजाले तक ले जाता है…!!
