
सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा स्वीकार किए जाने के बाद उत्तर भारत के कई हिस्सों में विरोध तेज़ हो गया है। केंद्र सरकार की सिफ़ारिश पर अदालत ने कहा है कि आसपास की ज़मीन से कम से कम 100 मीटर ऊँचे भू-भाग को ही अरावली पहाड़ी माना जाएगा। साथ ही, 500 मीटर के भीतर मौजूद दो या अधिक पहाड़ियों को एक शृंखला का हिस्सा माना जाएगा।
पर्यावरणविदों का मानना है कि केवल ऊँचाई के आधार पर परिभाषा तय करने से अरावली की अनेक छोटी, झाड़ियों से ढकी पहाड़ियाँ संरक्षण से बाहर हो सकती हैं। ये क्षेत्र रेगिस्तान बनने से रोकने, भूजल रिचार्ज और स्थानीय आजीविका के लिए अहम हैं। इसी आशंका के चलते गुरुग्राम, उदयपुर सहित कई शहरों में शांतिपूर्ण प्रदर्शन हुए, जिनमें स्थानीय लोग, किसान और पर्यावरण कार्यकर्ता शामिल रहे।
‘पीपल फ़ॉर अरावलीज़’ की नीलम आहलूवालिया और पर्यावरण कार्यकर्ता विक्रांत टोंगड़ का कहना है कि अरावली को उसकी पर्यावरणीय और भूगर्भीय भूमिका से पहचाना जाना चाहिए, न कि किसी मनमाने पैमाने से। उनका तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहाड़ी प्रणालियों का मूल्यांकन उनके कार्य से होता है, ऊँचाई से नहीं।
विपक्षी दलों ने भी चिंता जताई है। अखिलेश यादव ने इसे दिल्ली के अस्तित्व से जोड़ा, जबकि राजस्थान कांग्रेस नेता टीका राम जुल्ली ने अरावली को राज्य की जीवनरेखा बताया।
केंद्र सरकार ने इन आशंकाओं को खारिज करते हुए कहा है कि नई परिभाषा का उद्देश्य नियमों में स्पष्टता और एकरूपता लाना है। पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार, अरावली क्षेत्र में नए खनन पट्टे नहीं दिए जाएंगे और संरक्षित जंगलों व पर्यावरण-संवेदनशील इलाक़ों में खनन पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा। मंत्री भूपेंद्र यादव ने दावा किया कि 1.47 लाख वर्ग किलोमीटर में फैली अरावली शृंखला का केवल लगभग 2% हिस्सा ही सख़्त शर्तों के साथ उपयोग में आ सकता है।
इसके बावजूद, आंदोलन से जुड़े समूहों ने संकेत दिए हैं कि वे कानूनी लड़ाई जारी रखेंगे और नई परिभाषा को चुनौती देंगे।
