
मुजफ्फरपुर@बिहार
पानी टंकी चौक स्थित जिला स्कूल प्रांगण में “आओ, गाएँ रामकथा घर-घर में” आध्यात्मिक आंदोलन के प्रणेता पूज्यश्री प्रेमभूषण महाराज के व्यासत्व में हरियाणा सेवासंघ द्वारा 30 दिसम्बर तक आयोजित नौ दिवसीय रामकथा के दौरान पूज्यश्री प्रेमभूषण महाराज ने व्यासपीठ से श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि भगवान शिव देव नहीं, महादेव हैं; किंतु भगवान राम और श्रीकृष्ण देव नहीं, साक्षात ब्रह्म हैं।
उन्होंने कहा कि अपने से श्रेष्ठ व्यक्ति से कभी कुशलक्षेम नहीं पूछना चाहिए। सती और दक्ष प्रजापति के प्रसंग की चर्चा करते हुए पूज्यश्री प्रेमभूषण महाराज ने कहा कि जिसका चिंतन सार्थक नहीं होता, उसे कभी कोई समर्थक नहीं मिलता। साधक को मान–अपमान की परिधि से परे होना चाहिए।
मानस के व्यवहार घाट के ओजस्वी वक्ता प्रेमभूषण महाराज ने कहा कि अपनी जाति में निरादर मिलने पर पहले लोग प्राण त्याग देते थे, अब लोग स्थान त्याग देते हैं क्योंकि आज लोग जाति की परवाह करना छोड़ चुके हैं। हमारे जीवन का प्रत्येक सत्कर्म किसी के अपमान के लिए नहीं बल्कि सभी के सम्मान के लिए होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जगत में जीव का पहला कर्तव्य यह है कि वह भगवान का कार्य करने के पश्चात ही सांसारिक व्यवहार में प्रवृत्त हो क्योंकि यह जीवन हमें भगवान की कृपा-प्रसादी के रूप में प्राप्त हुआ है।
साधना के महात्म्य को प्रकाशित करते हुए पूज्यश्री प्रेमभूषण महाराज ने कहा कि साधना के प्रभाव से माँ पार्वती का नाम परिवर्तित होकर अपर्णा हुआ। इस प्रसंग का संदेश है कि “साधना से साधक सिद्ध हो जाता है।”
आज की सामाजिक व्यवस्था पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में पारिवारिक समन्वय बहुत कम दिखाई देता है। समन्वय वहीं संभव है, जहाँ संस्कार होते हैं। असहज भाव में रहने वाले लोगों में संस्कार प्रकट नहीं हो पाते।
जीव की विडंबना को रेखांकित करते हुए कथा-व्यास ने कहा कि जीव मृत्यु से नहीं डरता, वह अपने सुख के छिन जाने से भयभीत रहता है। शिव–पार्वती विवाह का मंगलगान करते हुए पूज्यश्री प्रेमभूषण महाराज ने कहा कि कोई किसी का विवाह नहीं करवाता, अतः इस विषय में किसी को दोष नहीं देना चाहिए, क्योंकि यह सब विधि द्वारा पूर्व निर्धारित होता है।
कथा-प्रवाह के दौरान प्रसंगानुसार “ठहरी नहीं ये ज़िंदगी”, “भूतवा नचाइ देइ देइ सगरो ताल”, “दुलहा के अजबे सुरतिया बाप रे बाप” जैसे लोकप्रिय भजनों और पारंपरिक मंगल गीतों को अपनी विशिष्ट शैली में प्रस्तुत कर पूज्यश्री प्रेमभूषण महाराज ने कथा में उमड़े अपार जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया।
