
■ सूर्यकांत उपाध्याय
एक छोटे से गाँव में चार माताएँ रहती थीं। चारों के बीच एक ही प्रश्न को लेकर अक्सर चर्चा होती रहती थी, “हम चारों में सबसे बड़ी कौन है?”
बहुत दिनों तक विचार हुआ पर कोई निष्कर्ष नहीं निकल सका। आखिर एक दिन उन्होंने तय किया कि पड़ोस में नई आई बहू से इसका उत्तर पूछा जाए।
बहू को समझदार और शांत स्वभाव की माना जाता था।
चारों माताएँ बहू के आँगन में पहुँचीं और बोलीं, “बहू-बेटी, हमारा निर्णय कर दो। हममें से कौन सबसे बड़ी है?”
बहू ने मुस्कराकर कहा, “पहले आप अपना-अपना परिचय तो दीजिए।”
पहली माता बोली, “मैं भूख हूँ। भूख सबसे बड़ी होती है। जिसके पेट में आग लग जाए, वह कुछ भी कर सकता है। इसलिए मैं ही बड़ी हूँ।”
बहू ने मुस्कराकर कहा, “भूख में विकल्प होते हैं, मैया। भूख 56 प्रकार के व्यंजनों से भी मिट सकती है और एक सूखी रोटी से भी।”
दूसरी माता बोली, “मैं प्यास हूँ। प्यास सबसे अधिक पीड़ा देती है, इसलिए मुझे ही सबसे बड़ा माना जाए।”
बहू बोली, “प्यास भी विकल्पों वाली है।
कभी गंगाजल से शांत होती है,
कभी विवशता में तालाब के कच्चे पानी से भी।”
तीसरी माता ने कहा, “मैं नींद हूँ। थका हुआ मनुष्य बिना नींद के कुछ भी नहीं कर सकता। इसलिए मुझे ही बड़ा मानो।”
बहू ने कहा, ”नींद भी विकल्प वाली है, मैया। कभी मुलायम बिस्तर पर आती है,
तो कभी पत्थरों की ज़मीन पर भी, जब समय पड़ता है।”
अंत में चौथी माता आगे बढ़ीं, “मैं आशा हूँ।”
बहू ने उनके चरण छुए और बोली, “मैया, आप ही सबसे बड़ी हैं। क्योंकि आशा का कोई विकल्प नहीं होता। भूख, प्यास और नींद, इन सबके विकल्प हैं, लेकिन
जिसके मन से आशा टूट जाए, वह चलती साँसों के बावजूद जी नहीं पाता।”
आशा ही मनुष्य को अँधेरे में दीपक दिखाती है, आशा ही दुख में सहारा बनती है, आशा ही जीवन की वास्तविक शक्ति है।
चारों माताएँ मौन हो गईं। बहू की बात उनके हृदय में उतर चुकी थी।
उन्होंने स्वीकार किया कि जीवन में सबसे बड़ी शक्ति आशा ही है।
