■ हिमांशु राज़

विश्व जलवायु संकट के बीच अब सबसे बड़ी पर्यावरणीय चुनौती प्लास्टिक प्रदूषण बन गई है। ‘ब्रेकिंग द प्लास्टिक वेव 2025’ नामक हालिया वैश्विक अध्ययन, जिसे द न्यू चैरिटेबल ट्रस्ट्स और ICP इंटरनेशनल ने जारी किया है, इस समस्या की भयावहता और इसके संभावित समाधानों का विस्तृत चित्र प्रस्तुत करता है।
रिपोर्ट का निष्कर्ष स्पष्ट है कि यदि दुनिया ने अपनी वर्तमान उपभोग और उत्पादन नीतियाँ नहीं बदलीं तो 2040 तक पृथ्वी पर सालाना 280 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होगा। यह आँकड़ा प्रतिदिन समुद्रों में गिरते कचरे के पहाड़ के समान है।
यह संकट केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है बल्कि जलवायु और स्वास्थ्य के साथ-साथ अर्थव्यवस्था पर भी घातक असर डाल रहा है। आज विश्व स्तर पर केवल 9 प्रतिशत प्लास्टिक ही पुनर्चक्रित होता है, जबकि लगभग 140 मिलियन टन प्लास्टिक खुले वातावरण में रिसता रहता है। रिपोर्ट में बताया गया है कि यदि तत्काल कोई हस्तक्षेप नहीं किया गया तो यह प्रदूषण तीन गुना तक बढ़ सकता है और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 58 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज होगी। आज की स्थिति में, यदि प्लास्टिक उत्पादन को एक देश माना जाए, तो वह विश्व का तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक बन जाएगा।

लेकिन इस अंधकार में उम्मीद की किरण भी है। अध्ययन बताता है कि यदि विश्व समुदाय समन्वित नीतियाँ बनाए और उत्पादन से लेकर पुनर्चक्रण तक प्रणालीगत बदलाव करे तो 2040 तक वार्षिक प्लास्टिक प्रदूषण में 80 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है। इसके लिए आवश्यक है कि हम ‘सिस्टम ट्रांसफॉर्मेशन’ की दिशा में सोचें-केवल कचरा प्रबंधन नहीं, बल्कि उत्पादन, उपयोग और पुनः प्रयोग की पूरी प्रक्रिया को नया आकार दें।
रिपोर्ट का पहला बड़ा संदेश यह है कि नई प्लास्टिक सामग्री के उत्पादन को सीमित किया जाए। ‘वर्जिन प्लास्टिक’ का निर्माण जलवायु के लिए अत्यधिक महँगा साबित हो रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, 2040 तक प्रति टन नए प्लास्टिक की जलवायु लागत 1600 से 2400 डॉलर के बराबर पहुँच जाएगी। इसलिए आवश्यक है कि उत्पादकों पर पर्यावरणीय कर या कार्बन मूल्य लागू किए जाएँ, ताकि कंपनियाँ पुनर्नवीनीकरण सामग्री की ओर रुख करें। ‘कैप-एंड-ट्रेड’ व्यवस्था के तहत प्रत्येक निर्माता को सीमित परमिट देने की सिफारिश भी की गई है, जिससे उत्पादन नियंत्रित रहे और उच्च आय वाले देश प्लास्टिक निर्माण में संयम बरतें।
दूसरा पहलू डिजजाइन से जुड़ा है। आज अधिकांश पैकेजिंग मिश्रित पॉलिमर से बनती है, जिससे रीसाइक्लिंग लगभग असंभव हो जाती है। यदि उद्योग एकल-पॉलिमर प्रणाली अपनाएँ, तो रीसाइक्लिंग दर दोगुनी हो सकती है और उत्सर्जन में 36 प्रतिशत तक की कमी संभव है। साथ ही, उत्पादों में प्रयुक्त रसायनों की पारदर्शिता और परीक्षण सुनिश्चित कर हानिकारक यौगिकों को चरणबद्ध रूप से हटाया जाना चाहिए।

इस संकट का एक सामाजिक आयाम भी है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। दुनिया में लगभग तीन-चौथाई प्लास्टिक पुनर्चक्रण कार्य अनौपचारिक श्रमिकों के भरोसे चलता है, जो बिना किसी सुरक्षा, पहचान या सम्मान के जीवनयापन करते हैं। रिपोर्ट भारत के पुणे स्थित ‘कागद कच्छ पत्रा कष्टकारी पंचायत (KKPKP)’ का उदाहरण देती है, जिसने हजारों कचरा बीनने वालों को औपचारिक पहचान दिलाई और उन्हें सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाया। प्लास्टिक सुधार की किसी भी नीति को तब तक प्रभावी नहीं कहा जा सकता, जब तक इन श्रमिकों के अधिकार और गरिमा सुनिश्चित न की जाए।
अन्ततः सबसे बड़ा सुधार पारदर्शिता के क्षेत्र में अपेक्षित है। कई कंपनियाँ अपने उत्पादों में मौजूद रसायनों की पूरी जानकारी तक नहीं रखतीं। रिपोर्ट सुझाव देती है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘नो डेटा, नो मार्केट’ नीति लागू होनी चाहिए अर्थात् बिना वैज्ञानिक प्रमाण और सुरक्षा परीक्षण के कोई नई प्लास्टिक सामग्री या रासायनिक यौगिक बाजार में न उतारा जाए। इससे न केवल जवाबदेही बढ़ेगी, बल्कि उद्योग और सरकार दोनों पर निगरानी भी सुदृढ़ होगी।
अध्ययन के अंतिम निष्कर्ष बताते हैं कि यदि सामूहिक प्रयास किए जाएँ तो वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 38 प्रतिशत कमी, माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण में 41 प्रतिशत गिरावट और कुल प्लास्टिक कचरे में लगभग 80 प्रतिशत तक कमी संभव है। इस बदलाव से एक हरित और स्वच्छ अर्थव्यवस्था का रास्ता खुलेगा, जिसमें लाखों नए रोजगार और उद्योगों की सतत् वृद्धि की संभावनाएँ बनेंगी।
दुनिया जिस ‘प्लास्टिक लहर’ में फँस चुकी है, उसे तोड़ना अब किसी एक सरकार या संगठन की जिम्मेदारी नहीं रह गई है। यह एक साझा संघर्ष है, जो पर्यावरणीय नीति, सामाजिक न्याय और आर्थिक सुधार तीनों को एक सूत्र में बाँधता है। यदि आज ठोस कदम उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियाँ शायद इस भयावह संकट से मुक्त संसार देख सकेंगी।
