खारघर में शिव पुराण महाकथा

● खारघर
सुविख्यात कथाकार और शांतिदूत देवकीनंदन ठाकुर महाराज ने शिवपुराण महाकथा के दौरान बताया कि भगवान की कथा में तिलक का नियम अत्यंत आवश्यक है। उनका स्पष्ट कहना था कि बिना तिलक किसी भी विधर्मी का कथा में प्रवेश नहीं होना चाहिए। महाराजश्री के अनुसार, तिलक केवल प्रतीक नहीं, बल्कि जीवन का संदेश है, यह स्मरण कराता है कि हमारा जीवन केवल भोग के लिए नहीं, बल्कि संयम, श्रद्धा, संस्कार और सदाचार के लिए है।
“जब हम तिलक धारण करते हैं, तब अहंकार त्यागकर ईश्वर के चरणों में स्वयं को समर्पित करते हैं। यही तिलक का वास्तविक भाव है,” महाराजश्री ने कहा। इसी कारण उन्होंने कथा में ‘नो तिलक, नो एंट्री’ का नियम बनाया है।

महाराजश्री इन दिनों नवी मुंबई के खारघर स्थित पेठपाड़ा मेट्रो स्टेशन के पास कॉरपोरेट पार्क ग्राउंड में शिवपुराण महाकथा का रसपान करा रहे हैं। श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “अपना सच्चा मित्र केवल गोविंद बनाइए। संसारिक मित्र समय और परिस्थिति के अनुसार बदल जाते हैं, पर गोविंद अर्थात भगवान श्रीकृष्ण कभी साथ नहीं छोड़ते। वे सुख-दुःख में हमारा हाथ थामे रहते हैं। जब हम गोविंद को अपना मित्र बना लेते हैं, तब भय, चिंता और अकेलापन समाप्त हो जाता है। उनका स्मरण हमें सही निर्णय लेने की शक्ति देता है तथा धैर्य और साहस प्रदान करता है।” महाराजश्री ने चंचुला का उदाहरण देते हुए कहा कि कैसे शिवमहापुराण कथा का श्रवण कर उसके जीवन में श्रद्धा और पश्चाताप का संचार हुआ, पाप कटे और जीवन को नई दिशा मिली।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भगवान शिव की कृपा किसी एक तक सीमित नहीं, वह हर उस व्यक्ति को प्राप्त होती है जो सच्चे हृदय से उनकी शरण में आता है। भजन और साधना पर बल देते हुए महाराजश्री ने कहा, “भजन से मन शांत होता है, बुद्धि शुद्ध होती है और हृदय में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। नियमित भजन नकारात्मकता को दूर करता है और जीवन में सुख, शांति तथा संतुलन बनाए रखता है।”
● महाराजश्री ने अपने भाषण में धर्म, परंपरा और जीवन नियमों पर भी जोर दिया:
- अपने धर्म की रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है।
- धर्म, संस्कृति और परंपराओं की रक्षा करने से ही आने वाली पीढ़ियाँ अपनी जड़ों से जुड़ी रहती हैं।
- लेटकर भोजन करना अशुभ माना गया है।
- टूटे-फूटे या क्षतिग्रस्त बर्तनों में भोजन करने से नकारात्मक ऊर्जा आकर्षित होती है।
- भोजन हमेशा स्वच्छ बर्तनों में, शांत मन से और ईश्वर का स्मरण करते हुए करना चाहिए।
- चंद्र और सूर्य ग्रहण के समय भोजन न करें।
