
● मुंबई
कांदिवली-पूर्व स्थित डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मैदान में श्री नारायण सेवा समिति, मुंबई के तत्वावधान में चल रहे श्रीमद् भागवत ज्ञानयज्ञ के सातवें दिव्य दिवस पर धर्म के मर्म पर सारगर्भित विमर्श हुआ। जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नारायणानन्द तीर्थ जी महाराज ने अपने उद्बोधन में स्पष्ट किया कि सनातन धर्म किसी सीमित अनुष्ठान का नाम नहीं बल्कि जीवन को सुसंस्कृत दिशा देने वाली शाश्वत जीवन-पद्धति है।
स्वामीजी ने ‘धारणात् धर्मः’ सूत्र की व्याख्या करते हुए कहा कि जो मनुष्य के आचरण में समाहित होकर उसे ऊँचाइयों की ओर अग्रसर करे, वही धर्म है। धर्म का स्वरूप केवल बाहरी कर्मकांड नहीं, अपितु सत्य, पवित्रता, क्षमा, दया, करुणा, दान, त्याग, संयम, स्वाध्याय और ईश्वर-भक्ति जैसे सद्गुणों का व्यवहार में उतरना है। उन्होंने कहा कि जब धर्म जीवन का अंग बनता है, तब हर कर्म उपासना बन जाता है और हर श्वास साधना का स्वरूप धारण कर लेती है।
श्रीमद् भागवत के विभिन्न प्रसंगों का उल्लेख करते हुए शंकराचार्य जी ने कहा कि ध्रुव का जीवन अटूट संकल्प और भक्ति की सामर्थ्य का उदाहरण है, प्रह्लाद विपरीत परिस्थितियों में अडिग विश्वास की प्रेरणा देते हैं, कालीय नाग दमन अहंकार के अंत और धर्म-विजय का प्रतीक है, जबकि गजेन्द्र मोक्ष यह संदेश देता है कि अंतिम आश्रय केवल नारायण हैं और भक्त की पुकार कभी निष्फल नहीं होती।
प्रवचन के समापन पर स्वामी नारायणानन्द तीर्थ जी महाराज ने कहा कि जहां धर्म प्रतिष्ठित होता है, वहां समाज में समरसता, नैतिकता, प्रेम और शांति स्वतः स्थापित हो जाते हैं। यह जानकारी काशी धर्म पीठ के प्रवक्ता प्रो. दयानंद तिवारी ने प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से दी।
