
● मुंबई
‘मानस की सार्थकता उसे पढ़ने में नहीं बल्कि जीने में है। भगवान की कथा सुनने से जीवन की समस्त व्यथाएँ शांत हो जाती हैं। कैलाश से भगवान शिव के मुखारबिंद से प्रवाहित रामकथा आज भी गुरु–शिष्य परंपरा में निरंतर प्रवाहमान है। वही रामकथा मैं अपने महाराज, प्रेममूर्ति पूज्यश्री प्रेमभूषण महाराज से श्रवण कर, आप सबको प्रेमपूर्वक गोरेगांव के इस प्रेमघाट पर सुनाने आया हूँ।’ ये उद्गार पूज्य राजन महाराज ने गोरेगांव के बांगुर नगर स्थित लक्ष्मी सरस्वती ग्राउंड में आयोजित नौ दिवसीय मानस महोत्सव में व्यक्त किए।
“रचि महेश निज मानस राखा” चौपाई का भाव स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस को अपनी नहीं, भगवान शिव की रचना माना और इसी भाव से इस चौपाई की रचना की। महाराज ने कहा कि राष्ट्र निर्माण के लिए बच्चों को कथा श्रवण के लिए अवश्य लाना चाहिए, ताकि वे संस्कारवान बन सकें। इस दृष्टि से बच्चों का कथा सुनना विशेष रूप से लाभदायी होता है।
कैलास मानसरोवर और मानस सरोवर की तुलना करते हुए उन्होंने कहा कि मानसरोवर में लोग दर्शन और स्नान से बाह्य रूप से शुद्ध होते हैं, जबकि मानस सरोवर में अवगाहन से बाह्य और आंतरिक, दोनों प्रकार की पवित्रता प्राप्त होती है। मानसरोवर में हंसों के दर्शन होते हैं, वहीं मानस सरोवर में संतों के दर्शन होते हैं। मानसरोवर में डूबने का भय है, किंतु मानस सरोवर में डूबने से तरने का लाभ मिलता है।

उन्होंने कहा कि ऐश्वर्य से सुख की प्राप्ति नहीं होती। यही कारण है कि लाखों के बिस्तरों पर सोने वाले भी नींद के सुख से वंचित रह जाते हैं, जबकि अखबार के पन्नों पर सोने वाले भी सुख की नींद सो लेते हैं। राजन महाराज ने भगवान शिव के कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि दिन भर माला फेरना ही भजन नहीं है। वास्तविक भजन किसी की पीड़ा को अनुभव करना, परहित का भाव जागृत करना और उसके अनुसार सेवा व सहयोग करना है। रक्त संबंधों से इतर सेवा और सहयोग करना ही सच्चा परोपकार है।
मनुष्य जीवन की श्रेष्ठता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि संवेदनशीलता और परोपकार का भाव ही मनुष्य को अन्य जीवों से श्रेष्ठ बनाता है। जीवन की हर स्थिति और परिस्थिति को भगवान की कृपा मानने वाला ही सच्चा भक्त है।
उल्लेखनीय है कि चंद्रकांत गुप्ता और चमेली देवी गुप्ता के पावन संकल्प से रामकथा सेवा समिति, मुंबई के तत्वावधान में 11 जनवरी तक आयोजित इस मानस महोत्सव का शुभारंभ भव्य कलश यात्रा से हुआ। लाल साड़ियों में सजी–धजी लगभग पाँच हजार से अधिक महिलाओं सहित हजारों पुरुषों और बच्चों ने इसमें सहभाग किया। कलश यात्रा में श्रद्धालुओं के सिर पर तांबे का कलश, मानस जी की पोथी और तुलसी जी का बिरवा शोभायमान था। ‘जय श्रीराम’ के उद्घोष के साथ गतिमान यह शोभायात्रा जनआकर्षण का केंद्र रही।
