■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक आदमी एक दिन लोटा लेकर जल भरने निकला। वह कुएँ पर पहुँचा, पर उसे लगा कि तालाब कुएँ से बड़ा होता है। वह तालाब गया, फिर सोचा कि नदी तालाब से भी बड़ी होती है। नदी पहुँचा तो विचार आया कि समुद्र में तो अनगिनत पानी है, चलो वहीं चला जाएँ, जहाँ सबसे अधिक जल हो।
वह समुद्र के पास पहुँचा। वहाँ सचमुच जल ही जल था, किन्तु जब लोटा भरने की बारी आई, तो उसने पाया कि चाहे समुद्र कितना ही विशाल क्यों न हो, उसके लोटे में उतना ही पानी आएगा, जितना उसमें समा सकता है। यह लोटा भाग्य का प्रतीक था। चाहे हम कितनी ही बड़ी जगह क्यों न पहुँच जाएँ, हमारे भाग्य का पात्र उतना ही ले सकता है, जितनी उसमें क्षमता है।
तुलसीदास जी भी कहते हैं-
जहाँ-जहाँ जाए तुलसी, सरिता, कूप, समुद्र।
जल बूँद न अधिक समाय, मिलि ही रहै दुर्बुद्ध॥
अब प्रश्न उठता है, जब हमें उतना ही मिलेगा जितना भाग्य में लिखा है, तो फिर भगवान को मानने की आवश्यकता क्या है? तर्क कहता है जब कर्म से ही भाग्य बनता है और भाग्य से ही फल मिलता है, तो फिर भगवान क्यों?
इसका उत्तर महापुरुषों ने अत्यंत सुंदर ढंग से दिया है। उत्तर यह है कि कर्म का फल अवश्य मिलता है, पर कर्म स्वयं फल देने में सक्षम नहीं होता।
उदाहरण के तौर पर एक छात्र ने मेहनत से पढ़ाई की, डिग्रियाँ लीं। पर क्या केवल डिग्री से नौकरी मिल जाती है? नहीं। जब कोई संस्था उसकी योग्यता को स्वीकार करती है, तभी उसे नौकरी मिलती है। यानी पढ़ाई कर्म है, पर फल तभी मिलता है जब कोई उसे स्वीकार करे। ठीक वैसे ही, भगवान हमारे कर्मों को स्वीकार कर ही हमें उनका फल प्रदान करते हैं।
अब सोचिए, दुनिया का मालिक ईश्वर, जिसे हमारे कर्मों की कोई आवश्यकता नहीं, वह फिर भी हमारे छोटे-छोटे कर्मों को स्वीकार करता है और हमें फल देता है। यही उसकी अनंत करुणा और कृपा है। इसीलिए भगवान को मानना चाहिए।
अब एक और घटना सुनिए।
संत तुकाराम जी को एक व्यक्ति ने अपने खेत की रखवाली का दायित्व सौंपा। फसल के समय देखा गया कि खेत में कुछ भी बचा नहीं है। क्रोधित होकर वह व्यक्ति तुकाराम जी से भरपाई की माँग करने लगा। तुकाराम जी ने शांत स्वर में कहा, ‘खेत कटवा लो।’
लोगों ने हँसी उड़ाई, ‘अब इसमें तिनका भी नहीं है, मिलेगा कहाँ से?’ पर जब खेत कटा, तो सब चकित रह गए। खेत के भीतर से भरपूर फसल निकली। जहाँ कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था, वहाँ भगवान की कृपा से पूरा 25 मन अनाज निकला।
ऐसी ही एक और घटना है।
तुकाराम जी एक बार गन्ने बेचने निकले। रास्ते में उन्होंने सारे गन्ने बाल-गोपाल को खिला दिए। घर पहुँचे तो केवल एक गन्ना बचा था। पत्नी को क्रोध आया और उन्होंने वही गन्ना तुकाराम जी की पीठ पर मार दिया। गन्ना दो टुकड़ों में टूट गया। तुकाराम जी मुस्कराए और बोले, “अब हमारे पास दो गन्ने हो गए, एक तुम खाओ, एक मैं।”
किसी ने पूछा, “आपको क्रोध नहीं आया?”
तुकाराम जी बोले, “यदि पत्नी अनुकूल होती तो मन संसार में लग जाता। प्रतिकूल मिली है, इसलिए मन भगवान में लगा है।”
नरसी मेहता की पत्नी का निधन हुआ, तो उन्होंने कहा, “भगवान की बड़ी कृपा है।”
इन सभी संतों ने विपरीत परिस्थितियों में भी भगवान की कृपा को देखा।
तो हम क्यों नहीं देख पाते?
हर रोज सोचिए, आज क्या मिला?
और जो भी मिला है, यह भी सोचिए, किसने दिया है?
परिवार, शरीर, धन, स्वास्थ्य; यह सब हमारा नहीं, ईश्वर की ही देन है।
इसलिए भगवान को मानिए, केवल भय के कारण नहीं बल्कि इसलिए कि वह बिना किसी आवश्यकता के हमारे कर्मों को स्वीकार करता है और हमें उनका फल देता है। यही उसकी सच्ची कृपा है।
