■ गोरेगांव-बांगुर नगर में श्रीराम कथा

● मुंबई
गोरेगांव पश्चिम स्थित बांगुर नगर के लक्ष्मी सरस्वती ग्राउंड पर चंद्रकांत गुप्ता एवं चमेली देवी गुप्ता के पावन संकल्प से, प्रेममूर्ति पूज्यश्री प्रेमभूषण महाराज के कृपापात्र पूज्य राजन महाराज के व्यासत्व में रामकथा सेवा समिति, मुंबई द्वारा आयोजित नौ दिवसीय रामकथा महोत्सव में पूज्य राजन महाराज ने अयोध्याकांड के आश्रय में रामकथा का सस्वर गायन किया।
कथा के दौरान उन्होंने निवेदन किया कि अयोध्याकांड को गोस्वामी तुलसीदास जी ने अत्यंत व्यवस्थित रूप से रचा है। महापुरुषों के अनुसार अयोध्याकांड मनुष्य जीवन की हृदय-स्थली है। अयोध्याकांड के प्रारंभ में सर्वप्रथम भगवान शिव की वंदना इसलिए की गई है क्योंकि भगवान शिव अपने परिवार के सदस्यों में व्यवहारिक भिन्नता होने के बाद भी सदैव शांत और प्रसन्न रहते हैं।
तुलसीदास जी दूसरी वंदना प्रभु श्रीराम की करते हैं, क्योंकि युवावस्था में जीवन अनेक झंझावातों से घिरा रहता है। जैसे, युवराज पद प्राप्त होने ही वाला था कि भगवान राम को वनवास मिल गया, फिर भी ऐसी विषम परिस्थिति में वे प्रसन्न और संतुलित रहते हैं। अयोध्याकांड मनुष्य को जीवन जीने की कला सिखाता है।
भगवान शिव को गुरु मानकर शिव-चर्चा करने वालों को संबोधित करते हुए पूज्य राजन महाराज ने कहा कि भगवान शिव किसी एक के नहीं, त्रैलोक्य के गुरु हैं। किंतु मनुष्य रूप में इस धरती पर आने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए गुरु की शरण में जाकर दीक्षा लेना अनिवार्य है। स्वयं शिव के अवतार स्वरूप आदि गुरु शंकराचार्य को भी गुरु-शरण में जाना पड़ा था।

व्यासपीठ से श्रोताओं का मार्गदर्शन करते हुए उन्होंने कहा कि बिना दीक्षा के भी नाम-जप किया जा सकता है, और यही नाम-जप अंततः साधक को सद्गुरु से मिलवा देता है।
भगवान राम के वनवास प्रसंग की चर्चा करते हुए पूज्य राजन महाराज ने कहा कि माता कैकेयी ने भगवान राम की इच्छा से महाराज दशरथ से दो वरदान लेकर संसार में अपने चरित्र को स्वयं कलंकित कर लिया। संसार में अज्ञानतापूर्वक किया गया प्रेम ही मोह कहलाता है।
केवट प्रसंग की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि केवट जी जान गए थे कि सारा चमत्कार भगवान राम के चरण-रज में ही है, इसी कारण वे प्रभु के चरण पखारना चाहते थे। केवट जी ने मन ही मन सोचा कि आज तक जो भी आता था, वह मुझे नौकर समझकर आदेश देता था, किंतु आज रामजी ने निवेदन करके मुझे स्वामी बना दिया। यह सामर्थ्य केवल भगवान में ही है।
केवट जी के घर भोजन नहीं था, फिर भी वे भगवान से कहते हैं—
“नाथ! न अब कछु चाहिय मोरे।”
और हम मंदिर जाकर नित्य भगवान से मांगते रहते हैं। इसी कारण हम भगवान के द्वार पर खड़े रहते हैं, जबकि भगवान केवट के प्रेमवश स्वयं केवट के द्वार पर खड़े रहते हैं। केवट की भक्ति के सामने हम सब तुच्छ हैं।
अतः जीवन में जो कुछ भी प्राप्त है, उसके लिए भगवान को धन्यवाद देना चाहिए।
कथा प्रसंगों के बीच पूज्य राजन महाराज ने
“कहियव दर्शन दिहै हो भिलनियव के राम”,
“किस धुन में बैठा बावरे”,
“जगत में कोई ना परमानेंट”,
“तोहरे गोड़वा के धुरिया से डर लागेला”,
“पांव अपना प्रभु जी धुला लीजिए”,
“करुणा निधान रउवा”,
“मुझे तूने मालिक बहुत दे दिया है”
जैसे भावपूर्ण भजनों का गायन कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
