■ सूर्यकांत उपाध्याय

राजस्थान के सीकर जिले में श्री खाटू श्याम जी का सुप्रसिद्ध मंदिर स्थित है। खाटू श्याम जी का वास्तविक नाम बर्बरीक था। महाभारत के एक प्रसंग के अनुसार बर्बरीक के शीश का अंतिम संस्कार राजस्थान प्रदेश के खाटू नगर में किया गया था। इसी कारण बर्बरीक जी खाटू श्याम बाबा के नाम से प्रसिद्ध हुए।
वर्तमान में खाटू नगर सीकर जिले में स्थित है। खाटू श्याम बाबा को कलियुग में भगवान श्रीकृष्ण का अवतार माना जाता है। श्याम बाबा घटोत्कच और नागकन्या मौरवी के पुत्र थे। पाँचों पांडवों में सर्वाधिक बलशाली भीम और उनकी पत्नी हिडिम्बा, बर्बरीक के दादा-दादी थे।
कहा जाता है कि जन्म के समय बर्बरीक के बाल बब्बर शेर के समान थे, इसलिए उनका नाम बर्बरीक रखा गया।
बचपन से ही बर्बरीक एक वीर और तेजस्वी बालक थे। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण और अपनी माता मौरवी से युद्धकला एवं शस्त्रविद्या सीखकर उसमें अद्भुत निपुणता प्राप्त की।
बर्बरीक ने भगवान शिव की घोर तपस्या की थी। तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें तीन चमत्कारी बाण प्रदान किए। इसी कारण बर्बरीक ‘तीन बाणधारी’ के नाम से भी प्रसिद्ध हुए।
भगवान अग्निदेव ने उन्हें एक दिव्य धनुष भी प्रदान किया था, जिसकी सहायता से वे तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने में समर्थ थे।
जब कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध होने का समाचार बर्बरीक को मिला तो उन्होंने भी युद्ध में भाग लेने का निश्चय किया। वे अपनी माता से आशीर्वाद लेकर यह वचन देकर निकले कि वे सदैव हारे हुए पक्ष का साथ देंगे।
इसी वचन के कारण यह प्रसिद्ध हुआ- ‘हारे का सहारा बाबा श्याम हमारा।’
युद्ध के लिए जाते समय मार्ग में उन्हें एक ब्राह्मण मिला। वह कोई और नहीं, स्वयं भगवान श्रीकृष्ण थे, जो बर्बरीक की परीक्षा लेना चाहते थे। ब्राह्मण वेश में श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से पूछा कि वे मात्र तीन बाण लेकर युद्ध में कैसे जाएंगे।
बर्बरीक ने उत्तर दिया कि उनका एक ही बाण सम्पूर्ण शत्रु सेना को नष्ट करने में सक्षम है और वह बाण लक्ष्य भेदने के बाद पुनः उनके तरकश में लौट आता है।
उन्होंने कहा कि यदि तीनों बाणों का उपयोग कर लिया जाए तो सम्पूर्ण जगत का विनाश संभव है।
यह सुनकर ब्राह्मण बने श्रीकृष्ण ने पास खड़े एक पीपल के वृक्ष की ओर संकेत करते हुए कहा कि वे एक ही बाण से उसके सभी पत्तों को भेदकर दिखाएँ।
बर्बरीक ने भगवान का ध्यान कर बाण छोड़ दिया। बाण ने पीपल के सभी पत्तों को भेद दिया और अंत में ब्राह्मण के चरणों के चारों ओर घूमने लगा।
वास्तव में श्रीकृष्ण ने एक पत्ता अपने पैर के नीचे छिपा लिया था। बर्बरीक समझ गए कि बाण उसी पत्ते को भेदने का प्रयास कर रहा है। उन्होंने विनम्रतापूर्वक कहा, ‘हे ब्राह्मण, कृपया अपना पैर हटा लें, अन्यथा यह बाण आपके चरणों को वेध देगा।’
बर्बरीक के पराक्रम से श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने पूछा कि वे युद्ध में किस पक्ष का साथ देंगे। बर्बरीक ने कहा कि उन्होंने किसी पक्ष का चयन नहीं किया है; वे तो अपने वचन के अनुसार सदैव हारे हुए पक्ष की ओर से ही युद्ध करेंगे।
यह सुनकर श्रीकृष्ण विचारमग्न हो गए क्योंकि कौरव इस वचन को जानते थे। कौरवों ने योजना बनाई थी कि युद्ध के प्रारंभिक चरण में वे जान-बूझकर कमजोर दिखेंगे ताकि बर्बरीक हारे हुए पक्ष के रूप में उनका साथ देने आ जाएँ।
यदि बर्बरीक कौरवों की ओर से युद्ध करते तो उनके चमत्कारी बाण पांडवों का विनाश कर देते।
कौरवों की इस योजना को विफल करने के लिए ब्राह्मण बने श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से दान माँगा। बर्बरीक ने बिना किसी हिचक के दान देने का वचन दे दिया।
तब श्रीकृष्ण ने उनसे दान में उनका शीश माँग लिया।
इस अद्भुत दान की माँग सुनकर बर्बरीक आश्चर्यचकित हुए और समझ गए कि यह ब्राह्मण कोई साधारण व्यक्ति नहीं है।
उन्होंने कहा कि वे अपने वचन के अनुसार शीश दान अवश्य करेंगे, लेकिन पहले ब्राह्मण अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हों।
तब भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य स्वरूप में प्रकट हुए। बर्बरीक ने कहा, ‘हे देव! मैं अपने वचन से बँधा हूँ, लेकिन मेरी यह इच्छा है कि मैं इस महायुद्ध को अपनी आँखों से देख सकूँ।’
बर्बरीक की वचनबद्धता से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने उनकी यह इच्छा पूर्ण करने का वरदान दिया। बर्बरीक ने अपना शीश काटकर भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित कर दिया।
श्रीकृष्ण ने चौदह देवियों द्वारा अमृत से उस शीश का अभिषेक करवाया और उसे युद्धभूमि के समीप एक पहाड़ी पर स्थापित कर दिया, जहाँ से बर्बरीक सम्पूर्ण युद्ध देख सकें। इसके पश्चात बर्बरीक के धड़ का शास्त्रोक्त विधि से अंतिम संस्कार किया गया।
महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ और पांडव विजयी हुए। विजय के बाद पांडवों में यह विचार होने लगा कि इस विजय का वास्तविक श्रेय किसे दिया जाए।
तब श्रीकृष्ण ने कहा कि चूँकि बर्बरीक इस युद्ध के साक्षी रहे हैं, इसलिए इस प्रश्न का उत्तर वही दे सकते हैं।
परमवीर बर्बरीक ने कहा कि इस युद्ध की विजय का श्रेय केवल और केवल भगवान श्रीकृष्ण को जाता है क्योंकि यह विजय उनकी अद्वितीय युद्धनीति और दिव्य माया के कारण ही संभव हुई।
इस सत्य वचन से प्रसन्न होकर देवताओं ने बर्बरीक पर पुष्पवर्षा की और उनका गुणगान किया।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, ‘हे वीर बर्बरीक! आज से तुम मेरे नाम ‘श्याम’ से प्रसिद्ध होगे। कलियुग में तुम मेरे अवतार रूप में पूजे जाओगे और अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करोगे।’
भगवान श्रीकृष्ण का यह वचन आज भी सिद्ध होता दिखाई देता है। आज भी श्री खाटू श्याम बाबा अपने भक्तों पर निरंतर कृपा बनाए रखते हैं।
