● क्या हम छोटी सुनामी का इंतजार कर रहे हैं?

■ हिमांशु राज़
भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई, जहां चमचमाती इमारतें आकाश को चीरती हैं और तेज रफ्तार जीवन का जादू बिखेरती हैं, वहां एक चुपचाप, क्रूर तबाही रच रही है। समुद्री तटों पर बसे मैंग्रोव वन, ये घने हरे-भरे परदे न केवल भारी मानसूनी वर्षा को सोखकर बाढ़ की विभीषिका से शहर को ढाल बनाते हैं बल्कि तटीय मिट्टी को समुद्र की लहरों के कटाव से बचाते हैं। पक्षियों के झुंडों, मछलियों के प्रजनन स्थलों, केकड़ों और छोटे जलचरों का प्राकृतिक आश्रयस्थल, स्थानीय मछुआरों का जीवन आधार, ये वन जैव विविधता के संरक्षक हैं। किंतु अवैध कब्जे, विशाल रियल एस्टेट परियोजनाएं, मेट्रो व सड़क विस्तार और प्रशासनिक उदासीनता ने इन्हें अस्तित्व की कठिन लड़ाई में धकेल दिया है। ठाणे की खाड़ी से लेकर वसई-विरार के पश्चिमी तट तक ये क्षेत्र तेजी से सिकुड़ रहे हैं, मानो शहर की भूख इनकी जान ले रही हो।बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) की 2024 रिपोर्ट भयावह सच्चाई उजागर करती है।
पिछले दशक में मुंबई के 40 प्रतिशत मैंग्रोव क्षेत्र (करीब 12,000 हेक्टेयर) नष्ट हो चुके। ISRO के NRSC उपग्रह चित्र स्पष्ट साक्ष्य हैं हरियाली गायब, कंक्रीट के जंगल उग आए। पर्यावरणविद् डॉ. अनिल गुप्ता चेताते हैं, “मैंग्रोव शहर की प्राकृतिक ढाल हैं। इनके बिना 2005 जैसी बाढ़ दोबारा आ सकती है, जो और भयावह होगी लाखों घर बह जाएंगे।” बॉम्बे एनवायरनमेंटल एक्शन ग्रुप के दीपक अप्टे कहते हैं, “ये वन कार्बन सिंक हैं, जलवायु परिवर्तन के खिलाफ योद्धा। उनका विनाश मुंबई को असुरक्षित बना देगा।” क्या आधुनिकता के नाम पर यह अनमोल प्राकृतिक खजाना कुर्बान हो जाएगा?
● संकट का मूल केंद्र
इलाका-दर-इलाका तबाही का नक्शा बनता जा रहा है। दिवा-मुंब्रा की उपजाऊ भूमि पर बीते समय हंगामा मच गया। स्थानीय नगरपालिका ने वन विभाग के सहयोग से भूमि समतलीकरण शुरू किया, भारी बुलडोजर और जेसीबी मशीनें गरजीं, मैंग्रोव क्रूरता से चूरा कर समाप्त कर दिए गए।
● आसपास के निवासी व्याकुल
आगामी मानसून में ठाणे खाड़ी का पानी अनियंत्रित उफान मार सकता है, बाढ़ का भयानक खतरा मंडरा रहा है। रबोदी के रास्ते किनारे बनी हरियाली पार्क अब गंदे नालों की विषैली धाराओं से घिर चुकी है। अवैध कब्जा करने वालों ने जमकर फैलाव किया, निगरानी अधिकारी सोते रहे। जापानी उद्यान जैसे शांत स्थलों पर भी प्राधिकरण की महत्वाकांक्षी योजनाएं चल रही, वन कटाई का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। बॉम्बे हाईकोर्ट ने 2023 में ऐसे कटाव पर रोक लगाई थी, किंतु न्यायिक हस्तक्षेप की धज्जियां उड़ रही हैं।माहिम क्रीक के किनारों पर ध्वंस अभियान चले, मगर कुछ ही दिनों में नए अवैध ढांचे खड़े हो गए। द्वीप निर्माण के स्वप्न जैव विविधता को निगल रहे। चारकोप सेक्टर-8 में शेट्टी जैसे जागरूक नागरिक सड़क चौड़ीकरण परियोजना पर सवाल ठोक रहे, “पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) की अनदेखी हो रही, भविष्य दांव पर है।” कफ परेड से वरली तक बस्तियों का अनियंत्रित विस्तार, अंबेडकर नगरों का प्रसार मैंग्रोव को कुचल रहा। कन्नमवार इलाके में कूड़े के विशाल ढेर जमा, मीथेन गैस से प्रदूषण फैल रहा। वडाला का ज्वारीय मैदान अब असुरक्षित, समुद्र की लहरें सीधे शहर को निशाना बना सकती हैं। दहिसर से बोरिवली की ओर कंग कंपाउंड-जगत स्थल तक कब्जों का घना जाल बिछा। लोखंडवाला से गोता भूमि तक सरकारी जमीनों पर हस्तक्षेप, पाटिल नगर में एक के बाद एक कार्रवाई जरूरी हो गई है । लिंक रोड के किनारे पांडे जैसे पर्यावरण योद्धा मैदान में डटे रह कर अदालत की दहलीज पर लड़ रहे है। यह सिलसिला पूरे तटीय क्षेत्र का संकट है।

वनों के ह्रास से न केवल बरसात भयावह बनेगी, बल्कि मत्स्य उत्पादन 30 प्रतिशत तक गिर सकता है। गरीब मछुआरा समुदाय जिनकी नावें इन जंगलों पर निर्भर है, सबसे ज्यादा प्रभावित होगा, उनकी आजीविका छिन जाएगी। प्रदूषण बढ़ेगा, जैव विविधता नष्ट होगी। पुराने पर्यावरण नियम (CRZ अधिसूचना 2019) मौजूद हैं, लेकिन पालन ढीला। BMC और MCZMA की रिपोर्टें लापरवाही उजागर करती हैं, कारण? राजनीतिक दबाव और भ्रष्टाचार। प्राप्त व उपलब्ध आंकड़े चीख रहे है कि मैंग्रोव के विनाश से मुंबई का पारिस्थितिकी तंत्र चरमरा रहा है । 2021 की बाढ़ में इन्होंने 40 प्रतिशत पानी सोखा था, अन्यथा शहर डूब जाता। अब इनके बिना तटीय क्षरण तेज होगा, हर साल 2-3 मीटर मिट्टी खिसकेगी। मछली पकड़ घटने से 50,000 मछुआरों की आजीविका खतरे में होने के साथ उनकी कमाई आधी हो जाएगी। कार्बन अवशोषण कम होगा,जलवायु परिवर्तन तेज़ होने के साथ , समुद्र स्तर 2050 तक 30 सेमी ऊंचा हो जायेगा। विशेषज्ञ चेताते हैं, यह ‘साइलेंट किलर’ है, जो धीरे-धीरे शहर को निगल लेगा। ऐतिहासिक उदाहरण है कि 1993 की चक्रवाती बाढ़ में मैंग्रोव ने ही शहर बचाया था।
● समाधान की मजबूत राह
एकीकृत तटीय संरक्षण कार्य योजना समय आ गया है ‘मुंबई तटीय संरक्षण प्राधिकरण’ गठित करने का मुख्यमंत्री की प्रत्यक्ष निगरानी में। निम्नलिखित कदम तुरंत उठाएं:प्रवर्तन दस्ते का तत्काल गठन: जिला मजिस्ट्रेट, वन अधिकारी, पुलिस, BMC कर्मचारी एकजुट। दैनिक गश्त, फौरी अतिक्रमण हटाव, जीरो टॉलरेंस।उन्नत निगरानी: ड्रोन, सैटेलाइट सर्वे हर 15 दिन। दोषियों पर FIR, संपत्ति जब्ती, ब्लैकलिस्टिंग।जन जागरण लहर: स्कूल-कॉलेज में शिविर, मोहल्लों में व्याख्यान, सोशल मीडिया अभियान (#SaveMumbaiMangroves), पोस्टर। मछुआरा समुदाय को प्रशिक्षित करें, उन्हें संरक्षक बनाएं।परियोजना बंधन: हर नई योजना (मेट्रो, सड़क, हाईराइज) में EIA अनिवार्य, 50 मीटर बफर जोन, जन सुनवाई।कठोर दंड: 50 लाख जुर्माना, 5 वर्ष कारावास, त्वरित पर्यावरण अदालतें।रोपण महाअभियान: क्षतिग्रस्त 1000 हेक्टेयर में 10 लाख पौधे। NGO-समुदाय-मछुआरा साझेदारी, मॉनिटरिंग ऐप से ट्रैकिंग।नीतिगत सुधार: CRZ नियमों का सख्त पालन, वार्षिक ऑडिट, केंद्रीय फंडिंग।ये कदम उठें तो मुंबई का तट अजेय किला बनेगा। हर नागरिक का योगदान जरूरी, पेड़ लगाएं, शिकायत दर्ज करें (MCZMA हेल्पलाइन: 022-27574700)। शासकों की जिम्मेदारी बढ़ी है, वोट की राजनीति से ऊपर उठें। हरियाली बरकरार रही तो शहर सुरक्षित, समृद्ध और हरा-भरा होगा। आइए, इस प्राकृतिक धरोहर को बचाएं, वरना कल पछतावा ही बचेगा!
