■ पुस्तक समीक्षा@राजेश विक्रांत

नितिन सालुंखे मुंबई के प्राचीन इतिहास से अथाह प्रेम करने वाले लेखक, इतिहासकार व शोधकर्ता हैं। इनका अब तक का समस्त लेखन मुंबई के ऐतिहासिक महत्व व विशेषताओं को समर्पित रहा है। इसके पहले की पुस्तक ‘अज्ञात मुंबई’ काफी लोकप्रिय हुई थी। नई पुस्तक “अज्ञात मुंबई-2” के प्रकाशक मनोविकास प्रकाशन, पुणे के अरविंद सुनंदा घनश्याम पाटकर हैं। इसका प्रथम संस्करण 1 मई 2025 को प्रकाशित हुआ था। लेखक नितिन सालुंखे के ने इस किताब को मुंबई पर प्रेम करने वाले सभी लोगों को समर्पित किया है। पुस्तक के मनोगत में नितिन कहते हैं कि, “तीन- साढे तीन सौ सालों की कालावधि में लगभग 25- 26 वर्ग मील क्षेत्रफल वाले सात दीपों के इस शहर, शहर के लोगों के प्रति, पुरानी इमारतों, स्मारकों, रास्तों व पुलों के प्रति मुझे प्रचंड आकर्षण है। यह आकर्षण मुझमें दरअसल, बचपन से ही है। उसके बाद जब मैं थोड़ा जानने- समझने लायक हुआ तो यह आकर्षण काफी तेज हो गया। तब मैं सोचता था कि यहां पर बस्तियां कैसे बसी होंगी? सामने दिखने वाली प्राचीन इमारत में इतिहास ने कैसा करवट लिया होगा? रास्तों व पुलों का निर्माण कैसे हुआ होगा? और इस स्थान पर इतिहास की कौन सी घटना घटी होगी या इस जगह पर घटी घटना ने आगे क्या इतिहास बनाया होगा?
इसकी वजह से मुंबई को जानने की मेरी भूख लगातार बढ़ती गई। बता दूं कि मेरे लेखन व शोध का क्षेत्र मुंबई शहर तक यानी कोलाबा से पश्चिम में माहिम तक तथा पूर्व में सायन तक सीमित है तथा काल की मर्यादा 1661 में जब पुर्तगालियों से दहेज स्वरूप मुंबई द्वीप ब्रिटिशों को मिला, तब से लेकर 1947 में देश को स्वतंत्रता प्राप्त होने तक की है।” पुस्तक की प्रस्तावना में सुलक्षणा महाजन ने लिखा है कि ‘ब्रिटिश कालीन मुंबई का शोध’ पुस्तक का सूत्र है जबकि ‘मुंबई के इतिहास के बिखरे हुए टुकड़े’ इस पुस्तक का स्वरूप हैं।
“अज्ञात मुंबई- 2” में कुल 21 शोधपरक लेख हैं। गेटवे ऑफ इंडिया, ब्रिटिश साम्राज्यशाही के प्रदर्शन के प्रतीक मुंबई की ब्रिटिश प्रतिमाएं, काला घोड़ा, राजमहलों की मुंबई, मलवार हिल के पुराने ब्रिटिश बंगलों की कहानियां, भायखला का रेसकोर्स, महालक्ष्मी का धोबी घाट, ‘लालबाग’ नाम का रहस्य, चिंचपोकली नाम आखिर आया कहां से? भाऊ दाजी लाड म्यूजियम, एलीफैंटा दीप पर हाथी, रानी बाग, लेडी फ्रेरे टेंपल, ससून क्लॉक टावर, फ्लोरा फाउंटेन, रानी बाग में प्राणी संग्रहालय, पालकी का प्रवास, मुंबई की सड़कों पर दौड़ने वाली पहली मोटर कार, डॉ बाबासाहेब आंबेडकर मार्ग, घोड़पदेव: वाया कालाचौकी, फेर बंदर व मझगांव….! तथा उपसंहार।
“अज्ञात मुंबई-2” को पढ़ते हुए यह भरोसा सुदृढ होता है कि मुंबई खास तौर से पुरानी मुंबई का इतिहास लेखक नितिन सालुंखे की रग रग में समाहित है। वह किंवदंतियों, जनश्रुतियों व लोकोक्तियां में भरोसा करने की बजाय तथ्यों की गहराई तक जाकर पड़ताल करते हैं व विषय से संबंधित गहन शोध करते हैं, तब जाकर अपनी बात को मजबूती से रखते हैं। इसलिए “अज्ञात मुंबई- 2” में समाहित अनेक तथ्य, बातें, कथाएं व उपकथाएं पाठकों को पल-पल रोमांचित करते हैं। दरअसल, नितिन सालुंखे ने बड़ी मेहनत से “अज्ञात मुंबई-2” का सृजन किया है। इस पुस्तक में जिन अनसुनी बातों ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया है तथा मेरा ज्ञानवर्धन किया है, वह इस प्रकार हैं–
एक समय कपास को इसकी बढ़ती हुई कीमत तथा इसकी व्यावसायिक उपयोगिता की वजह से “सफेद सोना” कहा जाता था। वास्तुकार जॉर्ज विटेट द्वारा गेटवे ऑफ इंडिया का बनाया गया डिजाइन 29 मार्च 1912 को मुंबई के दो महत्वपूर्ण अखबारों- ‘द बॉम्बे गजट’ और ‘द टाइम्स आफ इंडिया’ में प्रकाशित हुआ था।
4 दिसंबर 1924 को भारत के वायसराय लॉर्ड रीडिंग के कर कमलों द्वारा गेटवे ऑफ इंडिया के उद्घाटन के बाद उस जगह का ‘अपोलो बंदर’ नाम इतिहास में समा गया और पंचम चार्ज की इच्छानुसार नया नाम “गेटवे ऑफ इंडिया” जन- मानस में प्रचलित होने लगा।
फर्स्ट मार्कविस चार्ल्स कार्नवालिस की मुंबई में पहली प्रतिमा 14 अक्टूबर 1824 को मुंबई ग्रीन (बाद का एलफिंस्टन सर्किल गार्डन तथा इस समय का हर्निमन सर्कल) के बीच खास तौर से बनाए गए रोमन पद्धति के कपोला- मंदिरनुमा संरचना में स्थापित की गई। प्रतिमा की भव्यता और सुंदरता से प्रभावित होकर मुंबईकरों ने कुछ ही दिनों बाद से प्रतिमा की किसी देवता की तरह पूजा करनी शुरू कर दी। वहां पर हिंदू लोग पान- सुपारी- फूलमाला- दक्षिणा व नारियल आदि चढ़ाकर मनौती मांगने लगे। वहां पर भक्तों की भीड़ इतनी बढ़ गई कि उन्हें रोकने के लिए ब्रिटिश सरकार ने वहां पुलिसकर्मी नियुक्त कर दिए थे। लेकिन कुछ दिनों बाद पुलिसकर्मी भी कार्नवालिस को देवता की तरह मानने लगे थे।
भूलाभाई देसाई रोड पर स्थित ब्रीच कैंडी अस्पताल से एकदम लगी हुई बिल्डिंग का नाम है- आनंद भवन। वर्तमान समय में यह भारत सरकार के परमाणु ऊर्जा आयोग के उच्च अधिकारियों का स्टाफ क्वार्टर है। मूलरूप में यह भवन बंशदा स्टेट ( जिला वलसाड, गुजरात) के राजा महारावल इंद्र सिंह जी प्रताप सिंह जी का राजमहल था।
प्लेग का टीका खोजने वाले डॉ वाल्डेमिर हॉफकिन ने 7 अक्टूबर 1896 को जेजे अस्पताल के एक कमरे में अपनी प्रयोगशाला की शुरुआत की थी। कुछ समय बाद जब वह जगह छोटी पड़ने लगी तो मुंबई महानगर पालिका ने उन्हें मालाबार हिल स्थित क्लिफ़ बंगला आवंटित कर दिया। यहां पर प्रयोगशाला 1 अप्रैल 1897 से लेकर दिसंबर 1897 यानी कुल 8 महीने तक रही, इस दौरान हाफ़किन यहीं निवास भी करते थे। इसके बाद उनकी प्रयोगशाला मझगांव के नेशबिट लेन स्थित प्रिंस आगा खान के खुसरो लॉज में स्थानांतरित कर दी गई तत्पश्चात प्रयोगशाला परेल के पुराने गवर्नमेंट हाउस में स्थापित की गई, जहां पर आज भी है।
आज का जहांगीर बोमन बेहराम मार्ग पूर्व व पश्चिम मुंबई को जोड़ने वाली पहली सड़क है। जो पूर्व के मझगांव से पश्चिम के कम्बाला हिल को जोड़ती है। इस सड़क के निर्माण के पीछे जन सेवा व अकाल ग्रस्त जनता की मदद करना प्रमुख ध्येय था। दरअसल, 1792 में गुजरात में भयंकर अकाल पड़ा और सूरत से सैकड़ों लोग मुंबई में आ गए। एक दिन ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी बेलासिस की नजर अकालपीड़ितों के जत्थे पर पड़ी। उस समय कंपनी सरकार के पास मझगांव से कंबाला हिल तक एक सड़क बनाने का प्रस्ताव विचाराधीन था। बेलासिस ने इस दिशा में तुरंत प्रयास करना शुरू किया। उसने मुंबईकरों से सड़क के लिए चंदा जमा किया, सरकार से रकम मंजूर करवाई व कुछ पैसे खुद भी डाले। उसके बाद उसने अकाल पीड़ितों को सड़क बनाने के काम पर रख लिया। उनके खाने- पीने की जिम्मेदारी सरकार ने उठाई और 1 साल में 1793 में यह कच्चा रास्ता बन गया और इसका नाम बेलासिस रोड रखा गया।
महालक्ष्मी का धोबी घाट पहले उस स्थान पर था जहां पर आज विक्टोरिया टर्मिनस यानी छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस स्थित है। यह अपनी वर्तमान जगह पर 7 जुलाई 1877 में स्थानांतरित किया गया।
लालबाग को “लालबाग” नाम मुंबई के मशहूर पारसी व्यवसाई और जहाज निर्माता वाडिया परिवार से संबंधित दादा भाई पेस्टनजी वाडिया (1802- 1885) के ‘लालबाग’ नमक बंगले की वजह से मिला। यह बंगला 1825 के आसपास निर्मित किया गया था।
चिंचपोकली का नाम चिंच यानी इमली के पेड़ों की बहुतायत से नहीं पड़ा बल्कि यह नाम मुंबई मरीन डिपार्मेंट में सुपरिंटेंडेंट कैप्टन थॉमस बुखानन के बंगले के नाम- ‘”चिंटजपूगली” से पड़ा। 19 नवंबर 1862 को विक्टोरिया गार्डन के उद्घाटन समारोह की मुख्य अतिथि लेडी कैथरीन फ्रेरे ( मुंबई के गवर्नर सर बार्टल फ्रेरे की पत्नी) के सम्मान में उनकी एक अर्ध प्रतिमा एक गुंबद में स्थापित की गई और इस संरचना को लेडी फ्रेरे टेंपल कहा जाने लगा। बाद में इसमें से लेडी फ्रेरे की प्रतिमा हटाकर वहां शांति देवता यानी गॉड्स ऑफ पीस की प्रतिमा स्थापित की गई जो आज भी रानी बाग में देखी जा सकती है।
मुंबई विश्वविद्यालय के सुप्रसिद्ध राजाबाई क्लॉक टावर के अलावा मुंबई में ससून क्लॉक टावर भी है जो कि भायखला स्थित रानी बाग के प्रवेश द्वार पर स्थित है। हालांकि यह क्लॉक टावर ऊंचे- ऊंचे पेड़ों की वजह से नजर नहीं आता। ब्रिज से आने- जाने के समय दिखता है। यह एक समय लंदन की विश्व विख्यात “बिग बेन” की मुंबई में मिनी प्रतिकृति के रूप में जाना जाता था। 1864 में निर्मित इसकी घड़ियां आज भी चालू हालत में हैं।
फ्रेरे फाउंटेन (मुंबई के गवर्नर सर बार्टल फ्रेरे- कार्यकाल: 1862-186 7 के नाम पर बार्टल फ्रेरे मेमोरियल फाउंटेन अथवा फ्लोरा फाउंटेन) के दानदाता मुंबई के दानशूर व्यापारी करशेटजी फरदूनजी पारीख थे।
मुंबई में पहली मोटर कार एक ब्रिटिश एम जे पैक ने 24 फरवरी 1896 को आयत की थी। इसे फोर्ट के टमरिंड लेन स्थित मेसर्स कार एंड कंपनी’ज कैरिज रिपोजिटरी के शोरूम में प्रदर्शन करने के लिए रखा गया था। जबकि मुंबई की सड़कों पर पहली मोटर कर 1898 में क्रॉम्पटन ग्रीव्स कंपनी में इलेक्ट्रिक इंजीनियर फोस्टर ने दौड़ाई थी।
“अज्ञात मुंबई-2” में आपको इसी तरह से अनेक दिलचस्प प्रसंग तथा रोचक कहानियां पढ़ने को मिलेगी। 372 पृष्ठों की इस पेपरबैक कृति का मूल्य 599 रुपए है। जो कि इसमें समाहित अमूल्य ज्ञान के मुकाबले नाममात्र का है। मुंबई से प्रेम करने वाले सभी मुंबईकरों को इस पुस्तक को पढ़कर अपने ज्ञान में वृद्धि अवश्य करनी चाहिए।
