■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार एक राजा अपने सहचरों के साथ शिकार खेलने जंगल में गया। वहाँ शिकार के चक्कर में वे एक-दूसरे से बिछड़ गए। एक-दूसरे को खोजते हुए राजा एक नेत्रहीन संत की कुटिया में पहुँचा और अपने बिछड़े हुए साथियों के बारे में पूछा।
नेत्रहीन संत ने कहा, “महाराज, सबसे पहले आपके सिपाही गए हैं, बाद में आपके मंत्री गए और अब आप स्वयं पधारे हैं। इसी रास्ते से आगे जाएँ तो उनसे मुलाकात हो जाएगी।”
संत के बताए मार्ग पर राजा ने घोड़ा दौड़ाया और शीघ्र ही अपने सहयोगियों से जा मिला। संत के कथनानुसार वे सचमुच आगे-पीछे ही पहुँचे थे।
यह बात राजा के मन में घर कर गई कि नेत्रहीन संत को कैसे पता चला कि कौन किस ओहदे वाला है। लौटते समय राजा अपने अनुचरों के साथ संत की कुटिया में पहुँचा और उनसे प्रश्न किया, “आप नेत्रविहीन होते हुए भी कैसे जान गए कि कौन जा रहा है और कौन आ रहा है?”
राजा की बात सुनकर नेत्रहीन संत ने कहा, “महाराज, मनुष्य की हैसियत का ज्ञान नेत्रों से नहीं, उसकी बातचीत से होता है। सबसे पहले जब आपके सिपाही मेरे पास से गुजरे, तब उन्होंने मुझसे पूछा, ‘ऐ अंधे, इधर से किसी के जाते हुए की आहट सुनाई दी क्या?’ तब मैं समझ गया कि ये संस्कारविहीन व्यक्ति छोटे पद वाले सिपाही ही होंगे।
जब आपके मंत्री जी आए, तब उन्होंने पूछा, ‘बाबा जी, इधर से किसी को जाते हुए…?’ तब मैं समझ गया कि ये किसी उच्च ओहदे वाले हैं, क्योंकि बिना संस्कार वाला व्यक्ति बड़े पद पर आसीन नहीं होता। इसलिए मैंने आपसे कहा कि सिपाहियों के पीछे मंत्री जी गए हैं।
जब आप स्वयं आए, तो आपने कहा, ‘सूरदास जी महाराज, आपको इधर से निकलकर जाने वालों की आहट तो नहीं मिली?’ तब मैं समझ गया कि आप राजा ही हो सकते हैं, क्योंकि आपकी वाणी में आदरसूचक शब्दों का समावेश था। दूसरे का आदर वही कर सकता है, जिसे स्वयं दूसरों से आदर प्राप्त होता है। जिसे कभी कोई वस्तु नहीं मिलती, वह उसके गुणों को कैसे जान सकता है!
दूसरी बात, यह संसार एक वृक्ष के समान है। जैसे वृक्ष में डालियाँ बहुत होती हैं पर जिस डाली में अधिक फल लगते हैं, वही झुकती है। इसी अनुभव के आधार पर मैंने, नेत्रहीन होते हुए भी, सिपाहियों, मंत्री और आपके पद का अनुमान लगाया। यदि कोई भूल हुई हो, महाराज, तो क्षमा करें।”
राजा संत के अनुभव से प्रसन्न हुआ और संत की जीवनवृत्ति का प्रबंध राजकोष से करने का आदेश मंत्री जी को देकर राजमहल लौट आया।
