■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार की बात है। वीणा बजाते हुए नारद मुनि भगवान श्रीराम के द्वार पर पहुँचे।
“नारायण! नारायण!”
नारदजी ने देखा कि द्वार पर हनुमानजी पहरा दे रहे हैं।
हनुमानजी ने पूछा, “नारद मुनि! कहाँ जा रहे हैं?”
नारदजी बोले, “मैं प्रभु से मिलने आया हूँ।”
फिर नारदजी ने पूछा, “प्रभु इस समय क्या कर रहे हैं?”
हनुमानजी बोले, “पता नहीं, पर लगता है बही-खाते का कुछ काम कर रहे हैं। प्रभु बही-खाते में कुछ लिख रहे हैं।”
नारदजी ने आश्चर्य से कहा, “अच्छा? क्या लिखा-पढ़ी कर रहे हैं?”
हनुमानजी बोले, “मुझे पता नहीं, मुनिवर। आप स्वयं ही जाकर देख आइए।”
नारद मुनि प्रभु के पास पहुँचे और देखा कि प्रभु कुछ लिख रहे हैं।
नारदजी बोले, “प्रभु! आप बही-खाते का काम कर रहे हैं? यह काम तो किसी मुनीम को दे दीजिए।”
प्रभु बोले, “नहीं नारद, यह काम मुझे ही करना पड़ता है। इसे मैं किसी और को नहीं सौंप सकता।”
नारदजी बोले, “अच्छा प्रभु, ऐसा कौन-सा काम है? इस बही-खाते में आप क्या लिख रहे हैं?”
प्रभु बोले, “तुम क्या करोगे देखकर, जाने दो।”
नारदजी ने आग्रह किया, “नहीं प्रभु, बताइए, आप इस बही-खाते में क्या लिखते हैं?”
प्रभु बोले, “नारद, इस बही-खाते में उन भक्तों के नाम हैं जो मुझे हर पल भजते हैं। मैं उनकी नित्य हाजिरी लगाता हूँ।”
नारदजी बोले, “अच्छा प्रभु, ज़रा बताइए तो मेरा नाम कहाँ है?”
नारद मुनि ने बही-खाता खोलकर देखा तो उनका नाम सबसे ऊपर लिखा था। यह देखकर नारदजी को गर्व हुआ कि प्रभु उन्हें सबसे बड़ा भक्त मानते हैं।
पर तभी उन्होंने देखा कि उस बही-खाते में हनुमानजी का नाम कहीं नहीं था।
नारदजी सोच में पड़ गए कि हनुमानजी तो प्रभु श्रीराम के परम भक्त हैं, फिर उनका नाम इस बही-खाते में क्यों नहीं है? क्या प्रभु उन्हें भूल गए हैं?
नारद मुनि हनुमानजी के पास आए और बोले, “हनुमान! प्रभु के बही-खाते में उन सभी भक्तों के नाम हैं जो नित्य प्रभु को भजते हैं, पर आपका नाम उसमें कहीं नहीं है।”
हनुमानजी ने विनम्रता से कहा, “मुनिवर, संभव है आपने ठीक से न देखा हो।”
नारदजी बोले, “नहीं-नहीं, मैंने ध्यान से देखा है। आपका नाम वहाँ कहीं नहीं था।”
हनुमानजी बोले, “अच्छा, कोई बात नहीं। शायद प्रभु ने मुझे उस योग्य नहीं समझा होगा कि मेरा नाम उस बही-खाते में लिखा जाए। पर नारदजी, प्रभु एक अलग दैनंदिनी भी रखते हैं, जिसमें वे नित्य कुछ लिखते हैं।”
नारदजी बोले, “अच्छा?”
हनुमानजी बोले, “हाँ!”
नारद मुनि फिर प्रभु श्रीराम के पास गए और बोले, “प्रभु! सुना है कि आप एक अलग दैनंदिनी भी रखते हैं। उसमें आप क्या लिखते हैं?”
प्रभु श्रीराम बोले, “हाँ, पर वह तुम्हारे काम की नहीं है।”
नारदजी बोले, “प्रभु! बताइए न, मैं देखना चाहता हूँ कि आप उसमें क्या लिखते हैं।”
प्रभु मुस्कुराए और बोले, “मुनिवर, मैं उसमें उन भक्तों के नाम लिखता हूँ, जिन्हें मैं नित्य भजता हूँ।”
नारदजी ने दैनंदिनी खोलकर देखा तो उसमें सबसे ऊपर हनुमानजी का नाम लिखा था। यह देखकर नारदजी का अभिमान टूट गया।
● संदेश: कहने का तात्पर्य यह है कि जो भक्त भगवान को केवल जिह्वा से भजते हैं, उन्हें प्रभु अपना भक्त मानते हैं, और जो हृदय से भजते हैं, उन भक्तों के स्वयं प्रभु भक्त बन जाते हैं। ऐसे भक्तों को प्रभु अपने हृदय-रूपी विशेष सूची में स्थान देते हैं।
