■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक फकीर सत्य की खोज में था। उसने अपने गुरु से पूछा, “सत्य कहाँ मिलेगा?”
गुरु ने कहा, “सत्य? सत्य वहाँ मिलेगा, जहाँ दुनिया का अंत होता है।”
उस दिन से वह फकीर दुनिया का अंत खोजने निकल पड़ा। कहानी बड़ी मधुर है। वर्षों तक चलते-चलते, भटकते-भटकते वह अंततः उस स्थान पर पहुँचा जहाँ आख़िरी गाँव समाप्त हो जाता था। उसने गाँव के लोगों से पूछा, “दुनिया का अंत कितनी दूर है?”
उन्होंने कहा, “ज़्यादा दूर नहीं। बस यही आख़िरी गाँव है। थोड़ी ही दूर पर वह पत्थर लगा है, जिस पर लिखा है, ‘यहाँ दुनिया समाप्त होती है।’ लेकिन उधर मत जाना, वहाँ बहुत खतरा है।”
फकीर हँसा। उसने कहा, “हम तो उसी की खोज में निकले हैं।”
लोगों ने कहा, “वहाँ बहुत भय होगा। जहाँ दुनिया समाप्त होती है, उस गड्ढे को तुम देख भी न सकोगे।”
पर फकीर तो उसी की खोज में था; उसने सारा जीवन उसी में लगा दिया था। उसने कहा, “हम तो उसी की तलाश में हैं। गुरु ने कहा है, जब तक दुनिया के अंत को न पा लोगे, तब तक सत्य नहीं मिलेगा। इसलिए जाना ही पड़ेगा।”
कहते हैं, वह फकीर गया। उसने गाँव वालों की बात नहीं मानी। वह उस स्थान पर पहुँचा जहाँ आख़िरी तख्ती लगी थी-“यहाँ दुनिया समाप्त होती है।” उसने एकटक वहाँ देखा। आगे शून्य था। उस खड्ड में कोई तलहटी न थी। आगे कुछ भी नहीं था।
आप उसकी घबराहट समझ सकते हैं। वह लौटकर इस तरह भागा कि जिसने पूरी जीवन-यात्रा वर्षों में तय की थी, उसे वापसी में कुछ ही दिनों में पूरी कर लिया। वह रुका नहीं, सीधा गुरु के चरणों में आ गिरा। तब भी काँप रहा था, बोल नहीं पा रहा था।
बड़ी मुश्किल से गुरु ने पूछा, “मामला क्या है? हुआ क्या?”
असल में वह फकीर गूँगे जैसा हो गया था। वह केवल पीछे की ओर इशारा करता था, क्योंकि जो देखा था, वह अत्यंत भयावह था।
गुरु ने कहा, “नासमझ! मैं समझ गया। लगता है, तू दुनिया के अंत तक पहुँच गया था और तुझे तख्ती मिली होगी, जिस पर लिखा होगा-‘यहाँ दुनिया का अंत होता है।’”
फकीर ने कहा, “बिलकुल ठीक, वही तख्ती मिली थी।”
गुरु ने पूछा, “क्या तूने तख्ती की दूसरी ओर देखा कि वहाँ क्या लिखा था?”
फकीर बोला, “दूसरी ओर? उस तरफ तो खाली शून्य था। मैं तो उस खड्ड को देखकर ही भाग आया। पानी के लिए भी नहीं रुका, भूख के लिए भी नहीं। दूसरी ओर देखने की हिम्मत ही नहीं हुई।”
गुरु ने कहा, “बस, यही भूल हो गई। यदि तू तख्ती की दूसरी ओर देख लेता, तो जहाँ इस ओर लिखा था-‘यहाँ दुनिया का अंत होता है’, वहीं दूसरी ओर लिखा होता-‘यहाँ से परमात्मा का प्रारंभ होता है।’”
असल में एक सीमा पूरी होती है, तब दूसरी सीमा आरंभ होती है। परमात्मा निराकार है। शून्य में उसी निराकार के समीप पहुँचा जा सकता है।
यह कहानी बड़ी कीमती है। ऐसा कहीं बाहर नहीं है कि तुम उसे खोजने निकल जाओ। यह भीतर की यात्रा है। जहाँ दुनिया समाप्त होती है, उसका अर्थ है, जहाँ राग-रंग समाप्त होते हैं; जहाँ जीवन के खेल-खिलौने समाप्त हो जाते हैं; जहाँ सब देख लिया, सब जान लिया, पर कुछ सार न पाया। सब बुदबुदे टूट गए, सब रंग फीके पड़ गए।
दुनिया के अंत का अर्थ है,जहाँ वासना समाप्त हो जाती है। वासना ही दुनिया है। महत्वाकांक्षा का विस्तार ही संसार है।
