■ सूर्यकांत उपाध्याय

“तुम कभी मेरी भावनाओं का ध्यान नहीं रखते। हर समय बस माँ जी की ही चिंता रहती है। अब मैं वहाँ वापस नहीं जाना चाहती। रहें अपनी माँ के साथ और खूब सेवा करें।”
ससुराल से लड़-झगड़कर मायके आई बेटी की भुनभुनाहट विभा जी काफी देर से सुन रही थीं। बात कोई बहुत बड़ी नहीं थी। घर-गृहस्थी के छोटे-छोटे मनमुटाव और खींचतान भर।
जब बेटी अपनी भड़ास निकालकर शांत हुई, तब विभा जी ने पूछा,
“जब हम सब्जी लेने जाते हैं, तो सही मात्रा कैसे लेते हैं?”
बेटी ने चौंककर कहा, “तराजू में तौलते हैं, और कैसे?”
“और सही तौल के लिए क्या करते हैं?”
“एक पलड़े में सब्जी रखते हैं और दूसरे में जितना चाहिए उतने का बाट,” बेटी ने थोड़ा झुंझलाते हुए जवाब दिया।
विभा जी मुस्कुराईं, “अगर हमें एक किलो सब्जी चाहिए, तो क्या दो सौ ग्राम के बाट से मिल जाएगी?”
“नहीं माँ, यह कैसे संभव है!” बेटी अब अधीर हो गई।
तब विभा जी ने गंभीर स्वर में कहा,
“तो फिर तुम सौ ग्राम सम्मान और प्यार देकर, किलो भर की उम्मीद कैसे कर सकती हो?”
बेटी चुप रह गई।
“बेटी, रिश्ते भी तराजू की तरह होते हैं। दोनों पलड़े तभी संतुलित रहते हैं, जब दोनों तरफ बराबरी का वजन हो। तुम सास को माँ जैसा सम्मान नहीं देती, पति को सहयोग नहीं करती, और चाहती हो कि सब तुम्हें सिर-आँखों पर बिठाएं, यह संभव नहीं है।”
विभा जी की बातों ने बेटी को सोचने पर मजबूर कर दिया।
“जितना प्रेम और सम्मान तुम ससुराल से चाहती हो, पहले उतना ही अपने हिस्से से दो। तभी रिश्तों का तराजू संतुलित रहेगा।”
बेटी की आँखें भर आईं। अब वह अपनी गलती समझ चुकी थी।
