
● मुंबई
महाराष्ट्र में 1 मई से रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए ‘व्यावहारिक मराठी’ अनिवार्य करने के प्रस्ताव ने सियासी और सामाजिक बहस को तेज कर दिया है। इस फैसले के खिलाफ यूनियनों ने खुला विरोध जताते हुए आंदोलन का ऐलान कर दिया है, जिससे मामला अब टकराव की ओर बढ़ता दिख रहा है।
परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक की अध्यक्षता में हुई बैठक में यूनियन प्रतिनिधियों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मराठी पढ़ने-लिखने में असमर्थ चालकों के लाइसेंस रद्द करने का प्रस्ताव न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि कानूनी रूप से भी सवालों के घेरे में है। इस मुद्दे पर आगे की रणनीति तय करने के लिए 27 अप्रैल को गोरेगांव स्थित केशव गोरे स्मारक हॉल में एक बड़ी सभा बुलाई गई है।
यूनियन नेता शशांक राव ने चालकों से बड़ी संख्या में इस सभा में शामिल होने की अपील की है। बैठक में राजनीतिक हलकों की भी मौजूदगी रही, जहां संजय निरुपम ने भी भाग लिया।
सरकार का पक्ष है कि यह पहल यात्रियों और चालकों के बीच संवाद को सहज बनाने, सेवा की गुणवत्ता सुधारने और राज्य की राजभाषा को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से लाई जा रही है। रोजाना लाखों लोग सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करते हैं, ऐसे में भाषा की बाधा कई बार विवाद और गलतफहमी का कारण बनती है।
योजना के तहत चालकों के लिए मराठी प्रशिक्षण, लाइसेंस जारी करते समय भाषा परीक्षण और ऐप-आधारित सेवाओं के साथ बेहतर तालमेल जैसे कदमों पर विचार किया जा रहा है।
दूसरी ओर, यूनियन का तर्क है कि इस निर्णय से हजारों गैर-मराठी चालकों की आजीविका पर सीधा असर पड़ सकता है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह मुद्दा और अधिक तूल पकड़ने के संकेत दे रहा है।
