
● नई दिल्ली
सहमति से साथ रहने वाले वयस्कों के रिश्तों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि दो बालिग अपनी इच्छा से बिना विवाह साथ रहते हैं, तो केवल संबंध टूटने भर से उसे आपराधिक मामला नहीं बनाया जा सकता। हर विवाद को अपराध की दृष्टि से देखना न्यायोचित नहीं है।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान की पीठ एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें शादी का झूठा वादा कर दुष्कर्म का आरोप लगाया गया था। सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि दोनों पक्ष लगभग 15 वर्षों तक साथ रहे और उनका एक बच्चा भी है।
अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील से यह स्पष्ट करने को कहा कि आरोपित अपराध के आवश्यक तत्व इस मामले में किस हद तक सिद्ध होते हैं। पीठ ने संकेत दिया कि यदि कोई महिला अपनी सहमति से लंबे समय तक किसी संबंध में रहती है, तो बाद में केवल रिश्ते के समाप्त होने के आधार पर आपराधिक कार्रवाई उचित नहीं ठहराई जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने शिकायत दर्ज कराने में हुई देरी और पूरे घटनाक्रम के क्रम पर भी सवाल उठाए। सुनवाई में यह भी सामने आया कि महिला की आरोपी से मुलाकात एक परिचित के माध्यम से हुई थी और उस समय वह 18 वर्ष की विधवा थी।
अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में तथ्यों और परिस्थितियों का समग्र आकलन आवश्यक है, ताकि कानून की सीमाओं का संतुलित और न्यायसंगत उपयोग सुनिश्चित किया जा सके।
