
■ सूर्यकांत उपाध्याय
नरहरि सुनार पंढरपुर में रहते थे, किन्तु उनका हृदय काशी के भोले बाबा ने चुरा लिया था। शिव की भक्ति में वे इतने मग्न रहते थे कि पंढरपुर में रहकर भी उन्होंने विट्ठल भगवान् को न तो कभी देखा और न ही देखने के लिए उत्सुक थे। नरहरि सुनार का काम करते थे, इसलिए जब वे सोने के आभूषण बनाते, तब भी ‘शिव-शिव’ का नाम उनके होंठों पर सतत् रहता। इसी कारण उनके बनाए आभूषणों में दिव्य सौंदर्य झलकता था।
पंढरपुर में ही एक साहूकार रहता था, जो विट्ठल भगवान् का भक्त था। उसके कोई पुत्र नहीं था। उसने एक बार विट्ठल भगवान् से मनौती की कि यदि उसे पुत्र होगा, तो वह विट्ठल भगवान् को सोने की करधनी (कमरबंद) पहनाएगा।
विट्ठल भगवान् की कृपा से उसे पुत्र प्राप्त हुआ। वह प्रसन्नता से फूला न समाया और सोना लेकर भागा-भागा नरहरि जी के पास पहुँचा। उसने कहा, “नरहरि जी! विट्ठल भगवान् ने प्रसन्न होकर मुझे पुत्र प्रदान किया है। अतः मनौती के अनुसार मैं उन्हें रत्नजड़ित सोने की करधनी पहनाना चाहता हूँ। पंढरपुर में आपके अलावा ऐसी करधनी कोई नहीं बना सकता। आप यह सोना ले लीजिए और मंदिर जाकर उनकी कमर की नाप ले आइए।”
विट्ठल भगवान् का नाम सुनकर नरहरि जी बोले, “भैया! मैं शिवजी के अलावा किसी अन्य देवता के मंदिर में प्रवेश नहीं करता, इसलिए आप किसी दूसरे सुनार से यह करधनी बनवा लें।”
किन्तु साहूकार ने विनम्रता से कहा, “नरहरि जी! आपके जैसा श्रेष्ठ सुनार यहाँ कोई नहीं है। यदि आप मंदिर नहीं जाना चाहते, तो मैं स्वयं नाप ले आता हूँ।” अंततः नरहरि जी ने इसे स्वीकार कर लिया।
साहूकार नाप लेकर आया और नरहरि जी ने करधनी बना दी। जब वह करधनी मंदिर में विट्ठल भगवान् को पहनाई गई, तो वह चार अंगुल बड़ी निकली। साहूकार उसे वापस लाया, छोटा करवाया, पर इस बार वह चार अंगुल छोटी हो गई। ऐसा कई बार हुआ।
अंततः सबने सलाह दी कि नरहरि जी स्वयं नाप लें। बहुत आग्रह करने पर वे तैयार हुए, पर शर्त रखी कि वे आँखों पर पट्टी बाँधकर ही नाप लेंगे। साहूकार उन्हें मंदिर ले गया।
जब नरहरि जी ने मूर्ति को स्पर्श किया, तो उन्हें लगा कि वे जटाधारी, गंगाधर, नागाभूषण धारण किए भगवान् शिव का स्पर्श कर रहे हैं। उन्होंने आश्चर्य से पट्टी खोली, तो सामने विट्ठल भगवान् थे। पुनः पट्टी बाँधकर नाप लिया, तो फिर वही अनुभव हुआ। ऐसा कई बार हुआ।
तब नरहरि जी को अनुभूति हुई कि शिव और विट्ठल एक ही हैं। उन्होंने अपनी अज्ञान की पट्टी उतार दी और विट्ठल भगवान् के चरणों में गिरकर क्षमा माँगी।
विट्ठल भगवान् उनकी भक्ति से प्रसन्न हुए और उन्होंने अपने शीश पर शिवलिंग धारण कर लिया। यह दृश्य देखकर नरहरि जी भाव-विभोर हो उठे।
अब नरहरि जी ने प्रेमपूर्वक करधनी बनाई, जो बिल्कुल ठीक बैठी। इसके बाद वे विट्ठल को ही शिव का रूप मानने लगे और वारकरी परंपरा में शामिल हो गए।
