▪️ सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार नामदेव जी एकांत में भजन कर रहे थे। इसी बीच उनके घर में आग लग गई। यह सूचना देने के लिए कुछ लोग वहाँ पहुँचे। लोगों ने उनकी सहायता करने हेतु जो सामान बचाया जा सकता था, उसे बाहर निकालकर रख दिया।
जब वे घर पहुँचे तो उन्होंने सोचा कि आग में भी तो मेरे प्रभु ही विराजमान हैं। उन्होंने पड़ोसियों से कहा, हमारे प्रभु पधारे हैं और आप उनका भोग छीन रहे हैं। इतना कहकर उन्होंने बचाया गया शेष सामान भी आग में फेंक दिया।
लोगों ने सोचा कि अब कोई इनकी सहायता नहीं करेगा। इन्हें ठंड की रात में बाहर ही रहने दें। हमने कितनी कठिनाई से आग में झुलसकर यह सामान बचाया था और इन्होंने उसे फिर आग में डाल दिया।
उन्हें क्या पता था कि जिसके प्रियतम स्वयं प्रभु हों, उसके लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता। नामदेव जी निश्चिंत होकर उसी राख की गर्माहट के पास लेट गए।
प्रभु ने नामदेव जी के लिए एक नई कुटिया बनवा दी। वह सबसे सुंदर और सुगंधित सामग्री से निर्मित थी। स्वयं रुक्मिणी जी ने उसकी रचना में सहायता की।
उस कुटिया से ऐसी दिव्य सुगंध आ रही थी कि पूरे गाँव के लोग वहाँ आने लगे। गाँव वालों ने नामदेव जी से पूछा, ऐसी कुटिया बनवाने में कितने रुपए लगे? हम भी ऐसी ही कुटिया बनवाना चाहते हैं।
नामदेव जी ने कहा, यह बहुत महँगी है। अपने-अपने घरों से बाहर निकलकर हर वस्तु को आग लगा दीजिए और अपने जले हुए घर के बाहर बैठकर कीर्तन कीजिए। फिर हमारा मालिक स्वयं आकर मुफ्त में आपकी कुटिया बना देगा।
जिसने वैराग्य रूपी अग्नि में अपनी ममता को स्वाहा कर दिया है, जिसने अपना सर्वस्व प्रभु के चरणों में समर्पित कर दिया है, प्रभु उसकी जिम्मेदारी स्वयं ले लेते हैं।
यह सुनकर गाँव वाले पीछे हट गए और सभी ने श्रद्धापूर्वक नामदेव जी के चरणों में प्रणाम किया।॥
