▪️ सूर्यकांत उपाध्याय

काशी के मणिकर्णिका घाट पर कालू नाम का एक डोम रहता था। उसका काम अंतिम संस्कार कराना था, लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि वह हमेशा हँसता रहता था। लोग कहते थे, श्मशान में हँसने वाला या तो पागल होता है या फिर बहुत बड़ा ज्ञानी।
एक दिन नचिकेता वहाँ पहुँचा। उसने कालू को हँसते देखा तो नाराज होकर बोला, ‘यहाँ लोग अपने प्रियजनों को खोते हैं और तुम हँसते हो?’
कालू मुस्कुराया और बोला, ‘महाराज, बैठिए। श्मशान को केवल दुख की जगह मत समझिए।’
उस रात एक युवती की अर्थी आई। उसकी माँ विलाप कर रही थी। कालू ने शांत भाव से चिता सजाई और लड़की की चूड़ियाँ उसकी माँ को देते हुए कहा, ‘माई, आग में काँच पिघल जाएगा, लेकिन यादें नहीं।’
जब चिता जलने लगी तो उसने नचिकेता से कहा, ‘हम रोते इसलिए हैं क्योंकि छोड़ना नहीं चाहते। आग हमें छोड़ना सिखाती है।’
अगली रात एक 90 वर्षीय वृद्ध का शव आया। उसके चार बेटे बड़े अधिकारी थे, पर कोई अंतिम संस्कार में नहीं पहुँचा। पड़ोसी ही उसे घाट तक लाए थे। यह देखकर नचिकेता दुखी हो गया।
कालू ने राख की एक मुट्ठी हवा में उड़ाते हुए कहा, ‘श्मशान में सब बराबर हैं। यहाँ न पद चलता है, न पैसा। अंत में सब इसी राख में बदल जाते हैं।’
तीसरी रात घाट पर कोई अर्थी नहीं आई। गंगा किनारे बैठे नचिकेता ने पूछा, ‘क्या तुम्हें कभी मृत्यु का भय नहीं लगा?’
कालू बोला, ‘पहले लगता था। फिर समझ गया कि जीवन और मृत्यु दोनों किसी और के हाथ में हैं। हम तो केवल अपनी भूमिका निभाते हैं।’
कुछ महीनों बाद नचिकेता फिर घाट पर लौटा तो पता चला कि कालू स्वयं इस संसार से विदा हो चुका है। उसकी चिता की राख अभी ठंडी भी नहीं हुई थी। कालू का बेटा रो रहा था।
नचिकेता ने पूछा, ‘तुम्हारे पिता तो हमेशा हँसते थे, तुम क्यों रो रहे हो?’
बेटे ने उत्तर दिया, ‘वह हँसते थे क्योंकि उन्हें पता था कि उनके जाने पर हम रोएँगे।’
उस दिन नचिकेता पहली बार श्मशान में हँसा। लोगों ने कारण पूछा तो उसने कहा, ‘मैं हँस नहीं रहा, मैं समझ गया हूँ। मृत्यु अंत नहीं, एक परिवर्तन है। जो इस सत्य को जान लेता है, उसका जीवन भय और मोह से हल्का हो जाता है।’
बिल्कुल कालू की तरह।
▪️ नोट: यह एक साहित्यिक/दार्शनिक रचना है, ऐतिहासिक या तथ्यात्मक विवरण नहीं।
