▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक महिला अपने छोटे बेटे के साथ किराने की दुकान पर सामान खरीदने गई। खरीदारी के दौरान उसका मासूम बेटा दुकानदार को देखकर मुस्कुरा रहा था। उसकी निश्छल मुस्कान देखकर दुकानदार का मन प्रसन्न हो गया। उसे लगा मानो बच्चे की मुस्कान ने पूरे दिन की थकान दूर कर दी हो।
दुकानदार ने बच्चे को अपने पास बुलाया और नौकर से चॉकलेट का डिब्बा मंगवाकर कहा, ‘बेटा, जितनी चॉकलेट चाहिए, इस डिब्बे से ले लो।’ लेकिन बच्चे ने विनम्रता से मना कर दिया। दुकानदार ने कई बार आग्रह किया, फिर भी वह चॉकलेट लेने को तैयार नहीं हुआ।
यह सब उसकी माँ दूर खड़ी होकर देख रही थी। कुछ देर बाद दुकानदार ने स्वयं डिब्बे में हाथ डालकर मुट्ठी भर चॉकलेट निकाली और बच्चे की फैली हुई हथेलियों में रख दी। बच्चा खुशी-खुशी चॉकलेट लेकर माँ के पास लौट आया।
घर जाते समय माँ ने पूछा, ‘बेटा, जब अंकल तुम्हें खुद चॉकलेट लेने के लिए कह रहे थे, तब तुमने क्यों नहीं ली?’
बच्चे ने मुस्कुराते हुए अपने छोटे-से हाथ दिखाए और कहा, ‘माँ, मेरे हाथ छोटे हैं। अगर मैं खुद लेता, तो थोड़ी-सी चॉकलेट ही आती। लेकिन अंकल का हाथ बड़ा था, इसलिए उन्होंने जितनी दी, उससे मेरा पूरा हाथ भर गया।’
जीवन में भी यही सत्य है। हमारे हाथ छोटे हैं, लेकिन ईश्वर के हाथ और उनका हृदय असीम हैं। जब हम सब कुछ अपनी सीमित बुद्धि पर छोड़ने के बजाय प्रभु की इच्छा पर विश्वास रखते हैं, तो वह हमारी अपेक्षा से कहीं अधिक देते हैं।
- शिक्षा: जब हम विश्वास के साथ सब कुछ ईश्वर पर छोड़ देते हैं तो उनकी कृपा हमारी झोली अपेक्षा से कहीं अधिक भर देती है।
