▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक महिला अपने जीवन से बेहद निराश थी। उसके पास धन, सुख-सुविधाओं और सुंदर व्यक्तित्व की कोई कमी नहीं थी, फिर भी वह भीतर से खाली और दुखी रहती थी। कई मनोवैज्ञानिकों से इलाज कराने के बाद भी उसकी मायूसी दूर नहीं हुई। धीरे-धीरे वह आत्महत्या का विचार करने लगी और एक दिन इसी इरादे से शहर से दूर एक पहाड़ी की ओर निकल पड़ी।
रास्ते में उसने एक अधेड़ व्यक्ति को आवारा कुत्तों को रोटियाँ खिलाते देखा। उसके चेहरे पर अद्भुत संतोष और मुस्कान थी। महिला ने गाड़ी रोककर पूछा, ‘आप इतने खुश कैसे हैं? मुझे खुशी कब मिलेगी?’
व्यक्ति मुस्कुराया और बोला, ‘छह महीने पहले तुम मुझसे मिलतीं, तो शायद मुझसे अधिक दुखी इंसान कोई नहीं मिलता। मेरे जवान बेटे की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई और कुछ ही महीनों बाद मेरी पत्नी भी इस सदमे में चल बसी। मैं बिल्कुल टूट गया था।’
‘एक दिन घर लौटते समय एक छोटा-सा पिल्ला मेरे पीछे-पीछे आ गया। रात में वह ठंड से कांपता हुआ मेरे घर के बाहर बैठा था। दया आई, उसे अंदर लाया, दूध पिलाया और कंबल ओढ़ा दिया। उसे सुकून से खाते देखकर कई महीनों बाद मेरे चेहरे पर मुस्कान लौट आई। तभी मुझे एहसास हुआ कि निःस्वार्थ सेवा से मिलने वाली खुशी सबसे बड़ी होती है।’
उन्होंने आगे कहा, ‘उस दिन के बाद मैंने जरूरतमंदों, अनाथों, गरीबों और बेसहारा पशुओं की सेवा को अपना जीवन बना लिया। दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाने में ही मुझे अपनी खुशी मिल गई।’
महिला उनकी बात समझ चुकी थी। उसने अपनी गाड़ी वापस मोड़ ली। अब उसे पता चल गया था कि सच्ची खुशी पाने का रास्ता दूसरों को खुशी देने और निःस्वार्थ सेवा करने से होकर गुजरता है।
