
● मुंबई
साइबर वॉर आधुनिक युग की वह अदृश्य जंग है, जिसमें बारूद नहीं, कोड चलता है और सीमाएं नहीं, नेटवर्क निशाने पर होते हैं। इस डिजिटल संघर्ष में कोई देश बिना सैनिक भेजे प्रतिद्वंद्वी की जीवनरेखा पर प्रहार कर सकता है। हथियार होते हैं कंप्यूटर प्रोग्राम और युद्धभूमि बनता है इंटरनेट।
किसी राष्ट्र की बिजली व्यवस्था ठप कर देना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वर्ष 2015 में यूक्रेन के पावर ग्रिड पर हुए साइबर हमले ने हजारों लोगों को घंटों अंधेरे में डुबो दिया था। बिजली रुकते ही संचार, अस्पताल और उद्योग ठहर जाते हैं, जिससे अर्थव्यवस्था चरमराने लगती है।
वित्तीय ढांचे पर हमला भी उतना ही घातक है। बैंकिंग प्रणाली, स्टॉक एक्सचेंज और डिजिटल पेमेंट नेटवर्क को बाधित कर आर्थिक अस्थिरता पैदा की जा सकती है। यदि नागरिकों का अपने धन पर नियंत्रण कमजोर पड़े तो सामाजिक अशांति और निवेशकों के विश्वास में गिरावट स्वाभाविक है।
सैन्य क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं। मिसाइल रक्षा प्रणाली, रडार और सैटेलाइट संचार को बाधित कर रणनीतिक बढ़त हासिल की जा सकती है। उदाहरणस्वरूप इज़राइल की आयरन डोम जैसी रक्षा प्रणाली पर साइबर हस्तक्षेप की आशंका अक्सर चर्चा में रहती है। सरकारी वेबसाइट और डेटा सेंटर भी प्रमुख लक्ष्य होते हैं।
सूचना युद्ध इसका एक और आयाम है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, जैसे X, पर फर्जी खबरों के जरिये भय और भ्रम फैलाया जाता है।
अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने खतरे को और गहरा कर दिया है। एआई आधारित हमले तेज, सटीक और स्वचालित हो चुके हैं। इसके प्रतिकार में मजबूत फायरवॉल, उन्नत एन्क्रिप्शन, मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन और सतत निगरानी अनिवार्य हो गए हैं। सरकारें एथिकल हैकर्स और विशेष साइबर डिफेंस टीमों को सक्रिय रखकर इस अदृश्य युद्ध से मुकाबला कर रही हैं।
